सोमवार, 28 जुलाई, 2014 | 19:52 | IST
  RSS |    Site Image Loading Image Loading
 
वर्गीज कुरियन पर फख्र कीजिए
खुशवंत सिंह, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार
First Published:21-12-12 08:14 PM
 imageloadingई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ-

मैं जिन दिनों बंबई में था, अक्सर वर्गीज कुरियन के पास चला जाता था। वह अपनी बीवी के साथ आनंद की आनंद मिल्क कॉलोनी में रहते थे। मैं खासा हैरान था, उन्होंने जो भी किया था। किसान अपनी गाय-भैंसों का बचा हुआ दूध उनके पास बेचने आते थे। कुरियन ने ऐसा सिस्टम बनाया था, ताकि ज्यादा मुनाफा उन्हें मिल सके। एक मायने में उन्होंने वहां दूध की नदियां बहा दी थीं। उनकी वजह से यह देश दुनिया का सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन करने वाला बन गया था। मजेदार बात यह थी कि उसमें सरकार का कोई हाथ नहीं था। कुरियन जो भी कर रहे थे, उस पर उन्हें फा था। हम सब को भी उन पर फा होना चाहिए। मुझे हमेशा लगता रहा है कि उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए था। कुरियन के जाने के बाद भी वहां उनका काम जिंदा है। उनकी बीवी उस काम को आगे बढ़ाने में लगी हैं। सरकार को उनके काम का सम्मान करना चाहिए।

पंडित रवि शंकर
एक दौर में मैंने पंडित रवि शंकर को बहुत नजदीक से देखा था। यह मेरे ऑल इंडिया रेडियो के दिनों की बात है। मैं दो साल वहां रहा और तब उनसे अच्छा-खासा दोस्ताना हो गया था। उस वक्त वह शीला भरत राम को ट्य़ूशन भी देते थे। मैं और मेरी बीवी शीलाजी के दोस्त थे। और अक्सर उनके घर आया-जाया करते थे। अजीब बात है, रेडियो के पुरुष कर्मियों के बीच रवि शंकर बेहद लोकप्रिय थे। वे उनके इंतजार में बिछे रहते थे। उसका कारण सितार ही नहीं था। सितार के तो महान कलाकार वह थे ही। दरअसल, वह अजीबोगरीब किस्से सुनाने में भी उस्ताद थे। उनमें फूहड़ किस्से भी होते थे। उन्हें सुन-सुनकर रेडियो के लोग खूब मगन होते थे। मैं नहीं जानता कि उन्होंने बाद में भी किस्से सुनाना जारी रखा या नहीं। धीरे-धीरे वह दुनिया के महान संगीतकार हो गए थे। भारत रत्न से भी उन्हें नवाजा गया। पता नहीं, उन्हें किस्से सुनाने को वैसे लोग विदेश में मिले या नहीं। शायद वह अपने देश के खराब माहौल को पचा नहीं पाए। और तय किया कि अपने आखिरी दिन कैलिफोर्निया में ही गुजारेंगे।

डॉक्टर
कुछ दिन पहले की बात है। मेरे पेट में दर्द हो रहा था। मैंने अपने नौकर को पड़ोस के अपार्टमेंट में रहने वाले डॉक्टर आईपीएस कालरा को बुलाने भेजा। वह पांच मिनट में चले आए। मेरा ब्लड प्रेशर लेने के बाद उन्होंने पूछा, ‘पॉटी ठीक से आती है?’ मैंने कहा, ‘ठीक से नहीं आती।’ वह अपनी क्लीनिक गए और दवाइयां दे दीं। मेरा दर्द कम हो गया। उसके बाद वह आते-जाते रहे। हर बार यही पूछते कि पॉटी ठीक से आती है? और मेरा जवाब भी वही होता। फिर वह दवाई बदल देते। मुझे ऐसा महसूस होता है कि डॉक्टर को मरीज के कहने पर नहीं चलना चाहिए। उसे सही सलाह देनी चाहिए। यों अपनी पुरानी कहावत बिल्कुल सही है, ‘इलाज से बेहतर है बचाव।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 imageloadingई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ- share  स्टोरी का मूल्याकंन
 
टिप्पणियाँ
 

लाइवहिन्दुस्तान पर अन्य ख़बरें

आज का मौसम राशिफल
अपना शहर चुने  
धूपसूर्यादय
सूर्यास्त
नमी
 : 05:41 AM
 : 06:55 PM
 : 16 %
अधिकतम
तापमान
43°
.
|
न्यूनतम
तापमान
24°