गुरुवार, 31 जुलाई, 2014 | 04:46 | IST
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इच्छाशक्ति के आगे
राजीव कटारा
First Published:21-12-12 08:13 PM
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सोचते और परेशान होते रहे वह। आखिर कहां कमी रह गई। उन्होंने खूब काम किया था। इच्छाशक्ति की कोई कमी नहीं थी। फिर भी काम नहीं हो पाया। ‘कभी-कभी इच्छाशक्ति ही काफी नहीं होती है। उससे भी आगे जाने की जरूरत होती है। अपनी इच्छा की औरों के साथ हिस्सेदारी करनी पड़ती है। तब उसका वजन बढ़ता है।’ यह कहना है डॉ. मैग सेलिग का। वह आदत में बदलाव की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। वह फ्लोरसेंट वैली के सेंट लुई कम्युनिटी कॉलेज में काउंसलिंग की प्रोफेसर हैं। उनकी बेहद चर्चित किताब है, ‘चेंजपावर: 37 सीक्रेट्स टू हैबिट चेंज सक्सेस।’
 यह अक्सर हमारे साथ होता है। जब कुछ गड़बड़ होती है, तो हम अपनी इच्छाशक्ति पर ही सोचने लगते हैं। हमें लगता है कि शायद उसीमें कोई कमी रह गई। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वह काम हमारे अकेले के बस में नहीं होता। हम कोशिश करते हैं। कामयाबी नहीं मिलती।

इच्छाशक्ति भरपूर होती है। फिर भी काम नहीं हो पाता। तब हमें उस पर फिर से सोच- विचार की जरूरत होती है। हम जब इस दौर से गुजरते हैं, तब हमें अपनी इच्छा में औरों को शामिल करने की जरूरत होती है। उस इच्छा में आपके दोस्त हो सकते हैं। आपके साथी हो सकते हैं। जब हम अपने काम में औरों को जुटाते हैं, तो वह एक टीम वर्क जैसा हो जाता है। उसमें कई तरह के दिमागों का इस्तेमाल होता है। और जो काम अकेले नहीं हो पाता, वह किसीके जुड़ते ही खट से हो जाता है। मैग यही कहना चाहती हैं कि अपनी इच्छाओं में औरों को जोड़ लीजिए। तब वह काम अकेले का नहीं रह जाएगा। फिर कारवां बढ़ता ही जाएगा। यों भी इच्छाशक्ति का यह मतलब तो नहीं कि आप अकेले ही किसी काम को करेंगे। अपनी इच्छाशक्ति से कहीं ज्यादा जरूरी होती है, उस काम को करने की इच्छा।

 
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