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मोदी के दिल्ली कूच की भूमिका
निर्मल पाठक, राजनीतिक संपादक, हिन्दुस्तान First Published:20-12-12 07:17 PM

गुजरात के चुनाव परिणाम आने से पहले भी इसमें शायद ही किसी को संदेह रहा होगा कि भाजपा वहां फिर से सरकार बनाएगी। यह भी माना जा रहा था कि लगातार तीसरी बार भाजपा को सत्ता में लाने के बाद नरेंद्र मोदी केंद्र की राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाएंगे और पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की दावेदारी ठोकेंगे। जो परिणाम आए हैं, वे इन अपेक्षाओं को खारिज नहीं करते। भाजपा शानदार जीत हासिल कर तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है और यह तय है कि प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को जाहिर करने में जरा भी न झिझकने वाले मोदी को ज्यादा समय तक गुजरात में रोके रखना न भाजपा के लिए संभव होगा और न उसके संरक्षक संघ परिवार के लिए।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पार्टी की कीमत पर मोदी के लगातार बढ़ते कद ने भाजपा व संघ नेतृत्व को परेशान किया है। पिछले दो दशक के दौरान जिस तरह गुजरात में मोदी ने पार्टी व व्यक्तियों को गौण बना दिया है, उससे भाजपा के दिल्ली स्थित केंद्रीय नेताओं में आशंका पैदा होना स्वाभाविक है। मोदी अपनी पार्टी व एनडीए के घटक दलों में एक डर पैदा करते हैं, लेकिन रायसीना हिल तक पहुंचने के लिए भाजपा की उम्मीद भी वही हैं। भाजपा व संघ परिवार पर अब यह तय करने का दबाव होगा कि वह मोदी को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर अगले लोकसभा चुनाव की कमान सौंपे। यह सही है कि 10 साल बाद भी गुजरात दंगों के दाग धोने में असफल रहे मोदी का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए एनडीए के घटक दल जल्दी तैयार नहीं होंगे।

जद यू नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्पष्ट संकेत दे चुके हैं कि भाजपा यदि उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है, तो जद-यू एनडीए में नहीं रहेगा। दूसरे दल भी उनसे जुड़ने से परहेज कर सकते हैं। पर ऐसे समय, जब क्षेत्रीय दल वैचारिक प्रतिबद्धता की बजाय सत्ता से जुड़े रहने की प्रासंगिकता को तरजीह दे रहे हों, उसमें किसी भी संभावना को नकारना इतना आसान नहीं रह जाता। सच्चाई यह है कि मोदी भाजपा कार्यकर्ताओं के अकेले पसंदीदा नेता हैं। कार्यकर्ताओं का दबाव और राष्ट्रीय नेतृत्व में विकल्प का अभाव ऐसी मजबूरी है, जिसके चलते देर-सबेर मोदी के सामने समर्पण के अलावा संघ के पास कोई चारा नहीं है।

गुजरात में मोदी की इस जीत से कांग्रेस को चिंतित होना चाहिए। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से ही छवि का संकट झेल रही कांग्रेस पिछले दो तीन माह से कुछ राहत महसूस कर रही थी। आर्थिक व प्रशासनिक क्षेत्र में ताबड़तोड़ बड़े फैसले कर अगले वर्ष बजट सत्र तक वह अपनी छवि में बदलाव की उम्मीद कर रही है। गुजरात के परिणाम भाजपा को आक्रामक होने का मौका तो देंगे ही, केंद्र सरकार में कांग्रेस के सहयोगी और उसे बाहर से समर्थन दे रहे दलों का उस पर दबाव और बढ़ेगा।

कांग्रेस की कोशिश होगी कि इन परिणामों का हवाला देकर वह गैर भाजपा दलों को धर्मनिरेपक्षता को मजबूत करने के लिए इकट्ठा रखे। गुजरात में मोदी को पहले से भी बड़ा जनादेश मिलने के बाद अगले चुनावों में भावी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में अकेले जाने और गठबंधन की बजाय केवल कांग्रेस की सरकार बनाने के उसके मनसूबों पर पानी फिरना तय है।

जनवरी में जयपुर में होने वाले चिंतन शिविर में उसे एक बार फिर धर्मनिरपेक्ष ताकतों से यह अपील करनी पड़ सकती है कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए कांग्रेस को मजबूत करना कितना जरूरी है। यह तय है कि मोदी की जीत के बाद वाम मोर्चा सहित तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद में लगी समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम, तृण मूल कांग्रेस जैसे दलों के नेताओं का आत्मविश्वास और बढ़ेगा। इन ज्यादातर क्षेत्रीय दलों के मूल में कांग्रेस-विरोध है और जितनी ताकत से कांग्रेस धर्मनिरेपक्ष शक्तियों को एकजुट करने की कोशिश करेगी उतनी ही ताकत से ये दल उसकी कोशिशों को विफल करने में जुटेंगे।

बड़े राज्यों में धीरे धीरे कांग्रेस का प्रभाव कम हो रहा है। उसके राष्ट्रीय नेतृत्व की अपील कम हो रही है और संगठन का ढांचा चरमरा रहा है। राज्यों में उसके पास सक्षम नेतृत्व का अभाव है। आर्थिक संकट से ठीक तरह से निपटने की वजह से 2009 में जो मध्य वर्ग (कुल आबादी का करीब 30 फीसदी) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जरिये कांग्रेस से जुड़ा, वह भ्रष्टाचार, घपले-घोटालों के आरोपों के चलते दूर हुआ है। इसी तरह युवा वर्ग जो फेसबुक (एक अनुमान के मुताबिक, करीब छह करोड़ युवा फेसबुक से जुड़े हैं) को ही अपना धर्म मानता है, वह कांग्रेस के युवा नेतृत्व से उतना प्रभावित नहीं है, जितना पार्टी ने अंदाज लगाया था। ऐसे में, भाजपा यदि नरेंद्र मोदी को अगले चुनाव में अपना नेता बनाकर लड़ती है, तो कांग्रेस के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है कि वह एक बार फिर धर्मनिरपेक्ष ताकतों का मोर्चा बनाकर अगले चुनाव को सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरेपक्षता की लड़ाई बनाकर लड़े।

चुनाव से पहले गठबंधन के मसले पर भाजपा की बजाय कांग्रेस हमेशा फायदे की स्थिति में रही है। कांग्रेस या धर्मनिरपेक्ष खेमे के लिए राहत की बात यही हो सकती है पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, कर्नाटक, असम और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में मुस्लिम आबादी कई जगहों पर जीत-हार का फैसला करती है। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार व कर्नाटक को छोड़ दें, तो बाकी जगह भाजपा का जनाधार नहीं के बराबर है।

गुजरात के  साथ ही हिमाचल के चुनाव परिणामों ने यह सीख दी है कि मतदाता भरोसा चाहता है। गुजरात में उसे भरोसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी के अलावा कोई और उनके लिए ज्यादा बेहतर काम कर सकता है। यही स्थिति हिमाचल में भी है। वहां मतदाताओं को इसमें शक नहीं था कि कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का बेहतर विकल्प हो सकते हैं। यदि विकल्प बेहतर नहीं है, तो मतदाता उपलब्ध व्यवस्था में हेरफेर नहीं चाहता। यह कहना मुश्किल है कि राष्ट्रीय चुनावों में मतदाता का रुख अलग होगा।

अगले चुनाव में कांग्रेस और भाजपा, दोनों को इस चुनौती से दो-चार होना पड़ेगा। मोदी यदि उम्मीदवार होते हैं, तो कांग्रेस किस चेहरे को सामने रखती है, यह महत्वपूर्ण होगा। इस समय जिस तरह के हालात हैं, उसमें नेतृत्व के मसले पर कांग्रेस और भाजपा, दोनों एक-सी दुविधा में हैं। ऐसे में, तीसरा खेमा देवेगौड़ा युग की वापसी की संभावनाओं को लेकर खुश हो सकता है। भले ही यह खुशी कुछ दिनों या कुछ माह के लिए ही क्यों न हो।

 

 
 
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