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सीरीज हारकर टीम ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया
नीरज बधवार
First Published:20-12-12 07:15 PM
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आलोचना में अगर संयम न हो, तो मान सकते  हैं कि उसमें बदलाव की इच्छा कम और टांग खींचने की नीयत ज्यादा है और अगर आपकी ताकत को ही आप पर टोंट मारने में इस्तेमाल किया जाए, तो यह बात और भी साफ हो जाती है। मसलन भारतीय टीम अगर विदेशों में हारती है, तो यह उसकी कमजोरी नहीं, उसकी सीमा है। मगर ऐसी हर हार पर यह कहना कि भारतीय टीम तो हमेशा घर में ही जीतती है, उसे जान-बूझकर नीचा दिखाना है। अब अगर आप ऊंट से कहें कि भाई, तुम रेत पर तो अच्छा दौड़ लेते हा, मगर सड़क पर नहीं, तो ऐसा कहकर आप रेत पर दौड़ने की उसकी काबिलियत को तो कम आंक ही रहे हैं, साथ ही उसकी नीयत पर भी शक कर रहे हैं कि शायद वह सड़क पर दौड़ते समय कैजुअल हो जाता है। ऐसा ही कुछ भारतीय टीम के साथ भी हुआ है।

पिछले साल जुलाई में इंग्लैंड में चार-शून्य से हारे, तो आलोचकों ने कहा कि भारतीय टीम तो सिर्फ घर में जीतती है। नवंबर में वेस्टइंडीज को घर में हराया, तो कहा गया कि घर में तो तुम जीतते ही हो, ऑस्ट्रेलिया जाकर जीतो, तो मानें। टीम ऑस्ट्रेलिया गई और चार-शून्य से हार गई। आलोचक हंस-हंसकर लोटपोट हो गए। फिर इसी साल न्यूजीलैंड को जब हमने घर में हराया, तो आलोचक और जोर से हंसने लगे। इससे भारतीय टीम सदमे में आ गई। ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ वाली आलोचना ने उसे हिलाकर रख दिया। उसे लगा कि जब उसकी आलोचना का सबसे बड़ा आधार ही उसकी ताकत है, तो क्यों न उस आधार को ही निकाल दिया जाए। टीम इंडिया ने वैसा ही किया।

28 साल बाद टीम इंडिया इंग्लैंड से अपने घर में भी हार गई। और उसने उन तमाम आलोचकों का मुंह बंद कर दिया, जो कहते नहीं थकते थे कि भारतीय टीम तो सिर्फ घर में ही जीतती है। और इसका फायदा यह होगा कि अब जब हम विदेश में जाकर हारेंगे, तो कोई यह नहीं कह पाएगा कि भारतीय टीम तो सिर्फ घर में जीतती है, बल्कि सभी यह कहकर नजरअंदाज कर देंगे कि अरे, इन्हें छोड़ो, ये तो घर पर भी  नहीं जीत पाते।

 
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