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मायने जीवन के
प्रवीण कुमार First Published:20-12-2012 07:14:31 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

जीने की तुमसे वजह मिल गई है, बड़ी बेवजह जिंदगी जा रही थी.. गाने पर अटक गए वे। खुद से पूछा कि तुम्हारे जीने की क्या वजह है? अंदर से कोई साफ जवाब नहीं आया। उन्हें आभास हुआ कि वह एक उद्देश्यहीन जीवन जी रहे हैं, जिसमें बस समय का बीतना ही शामिल है। लेकिन हमारे जीवन में एक अदद उद्देश्य होने की वजह से कितना बदलाव आ सकता है? जवाब है आमूलचूल। पैसा, करियर आदि चीजों से हटकर आप बस इतना ठान लें कि कुछ ऐसा कर गुजरेंगे जिसके पूरा होने के बाद आप शांति और तसल्ली के साथ मर पाएं, तो समझिए जीवन यात्रा ठीक रही। शांति और तसल्ली के लिए यह जरुरी नहीं कि आप कोई बड़ा काम ही करें। यह आपके दैनंदिन के काम भी हो सकते हैं। छोटे से छोटे काम जो आपको सुकूल दें।

रवींद्रनाथ टैगोर इस बिंदु पर दार्शनिक भाव से कहते हैं कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को समय के किनारे पर पड़ी हुई ओस की भांति हलके हलके नाचने दे। यह नाच तभी हो सकता है जब आपका मन ओस की तरह ही हलका हो। आपके कर्म, विचार निर्मल हों। उनमें दूसरों के लिए जगह हो। सुभाष चंद्र बोस कहते हैं कि मनुष्य का जीवन इसलिए है कि वह अत्याचार के खिलाफ लड़े। जर्मन नाटककार बतरेल्त ब्रेख्त इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कविता में कहते हैं ‘तुम्हारा उद्देश्य यह न हो कि तुम एक बेहतर इंसान बने, बल्कि ये हो कि तुम एक बेहतर समाज से विदा लो’।

सफल होना ही हर स्थिति में जरुरी नहीं। नाविक लारेंस को याद करें। ओलंपिक में नौका रेस के मुकाबले के दौरान वह एकाएक अपने घायल प्रतियोगी की मदद के लिए रुक गए। नतीजा यह हुआ कि वह रेस में सबसे पीछे रहे। लेकिन चूंकि उन्होंने जीतने की इच्छा से अधिक दूसरे के जीवन को महत्व दिया इसलिए उनके लिए सबसे अधिक तालियां बजी थीं।

 
 
 
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