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संसद में हंगामे से किसी का क्या जाता है
राजेन्द्र धोड़पकर First Published:19-12-2012 10:14:12 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

सारे नेता दुखी हैं, गुस्से में हैं कि दिल्ली में चलती बस में एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। जब बलात्कार होता है, तो नेता बयान देते हैं कि बलात्कारियों को उम्रकैद दी जाए। अगला नेता एक कदम आगे बढ़कर कहता है- उन्हें फांसी की सजा दी जाए। इस डर से कि वह पीछे न रह जाए, एक अन्य नेता कहता है- दुष्कर्मियों को दो बार फांसी की सजा दी जाए।

यह गुस्सा तो ठीक है, लेकिन किसी नेता का कोई अपना आदमी या अपने आदमी का बेटा ऐसे किसी मामले में फंसता है, तो नेताजी कहते हैं- लड़का है, गलती हो गई, अब इसके लिए क्या फांसी पर चढ़ा दें? हम डांट देंगे, आइंदा ऐसी गलती नहीं करेगा। फिर वह किसी पुलिस अधिकारी को फोन करते हैं- वो जो रेप केस में फंसा है, अपना ही बच्चा है। लड़का थोड़ा शरारती है, लेकिन ऐसा बदमाश नहीं है। वह लड़की ही कुछ गड़बड़ थी, वरना ऐसा कैसे हो सकता था। जरा मामले को देख लीजिएगा।

सारे नेता संसद में पुलिस को कोस रहे हैं। मांग हो रही है कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो। पुलिस वाले सोच रहे हैं कि हमें पहले क्यों नहीं बताया कि हमारा काम जनता की रक्षा करना है। पुलिस वाले नौकरी करके रिटायर हो जाते हैं और यह राज उनसे छिपाया जाता है कि उनका काम उन लोगों की हिफाजत करना है, जो वीआईपी नहीं हैं। जो शराब का व्यापार नहीं करते, जो जमीनों पर कब्जा नहीं करते, जो हत्याएं नहीं करते, उनकी रक्षा के लिए किसी पुलिस वाले की डय़ूटी नहीं लगती। जब शराब के व्यापारी और जमीन माफिया किसी जमीन पर कब्जे के लिए खूनी लड़ाई लड़ते हैं, तो उनकी सुरक्षा में लगे पुलिस वाले उस लड़ाई में सक्रिय सहयोग करते हैं।

दिल्ली में जो लड़की टैक्सी का पैसा चुकाने की हैसियत नहीं रखती और रात में असुरक्षित बस में सफर करती है, उसके लिए सरकारी पुलिस का पीएसओ कैसे दिया जा सकता है? अगर उसने अपराध व बेईमानी से करोड़ों की दौलत कमाई होती, तो उसे तमाम राज्य सरकारों ने पीएसओ दिए होते। संसद में बलात्कारियों को फांसी की मांग करने में किसी का क्या जाता है।

 
 
 
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