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गुजरात के विकास की सबसे बड़ी बाधा
आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार
First Published:18-12-12 10:08 PM
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अगर भारत को दस फीसदी की दर से विकास करना है, तो गुजरात को 15 फीसदी की दर से आगे बढ़ना होगा- पिछले दस साल में नरेंद्र मोदी ने कई बार यह कहा है। सच यह है कि गुजरात 15 फीसदी की रफ्तार से विकास नहीं कर रहा। इस साल तो हो सकता है कि वह दस फीसदी की रफ्तार भी न पकड़ सके। गुजरात ने पहले जिस रफ्तार से विकास किया था, मोदी की अगुवाई में वह उस रफ्तार को कभी नहीं पकड़ सका। इसके कई कारण हैं।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 59 फीसदी है। जबकि गुजरात के जीडीपी में सेवा क्षेत्र की भागीदारी सिर्फ 46 फीसदी है, यानी राष्ट्रीय औसत से 13 फीसदी कम। उद्योगों के मामले में गुजरात काफी आगे है। पूरे देश में यह आंकड़ा 30 फीसदी है, जबकि गुजरात में 41 फीसदी। यह हमेशा से ऐसा ही रहा है। गुजरात ने बहुत आला दर्जे के उद्योगपति पैदा किए हैं। वैसे ही, जैसे बंगाल ने श्रेष्ठ कलाकार पैदा किए हैं। और गुजरात को कभी इसकी कमी खली भी नहीं। गुजरात में इस समय जो चीज नहीं है, वह नई अर्थव्यवस्था से आया पैसा। करोड़ों डॉलर का वह धन, जो देश के कई शहरी इलाकों में पश्चिम से आया है। कंसल्टेंसी फर्म केपीएमजी ने इसका बाकायदा विश्लेषण किया है कि जिस आईटी उद्योग व आईटी एनेबल सेवाओं ने भारत के कई शहरों को नई बुलंदी दी है, वे गुजरात से नदारद हैं। आखिर क्यों? यह निश्चित रूप से एक परेशान करने वाली पहेली है, क्योंकि गुजरात से काम करना सस्ता पड़ता है, यहां पर जमीन-जायदाद की कीमत ज्यादा नहीं है और न ही तनख्वाहें ऊंचे स्तर की देनी पड़ती हैं।

नरेंद्र मोदी ने इस समस्या से निपटने की कोशिश भी की है। कई तरह की जो नई नीतियां शुरू की गई हैं, उनमें प्रमुख हैं- आईटी पार्क और आईटी इकाइयां लगाने के लिए स्टांप डय़ूटी में रियायत, विशेष इकोनॉमिक जोन बनाना और वित्तीय मदद करना, पांच साल के लिए विद्युत अधिभार के भुगतान से मुक्ति और श्रम कानूनों को सरल बनाना। लेकिन इसका कोई असर नहीं दिखाई दिया। क्यों? केपीएमजी का कहना है कि आईटी उद्योग और आईटी एनेबल सेवाओं को शुरू करने के लिए सबसे जरूरी है कि प्रतिभाओं का पूल उपलब्ध हो। गुजरात में इस तरह का पूल उपलब्ध नहीं है। कंपनी ने इसके दो कारण बताए हैं- पहला इंजीनियरिंग संस्थानों का न होना और दूसरा अंग्रेजी भाषा की कुशलता का अभाव।

इस दूसरे कारण में इस पहेली का हल है कि गुजरात में मोदी का मध्य वर्ग क्यों नाकाम रहा। गुजरात में आने वाले इस बात को लेकर हैरत में पड़ जाते हैं कि यहां बहुत कम अंग्रेजी भाषा इस्तेमाल होती है। बहुत ऊंचे स्तर का कारोबार भी यहां गुजराती में ही होता है। सूरत में जब मैं अपने घर जाता हूं, तो अपने दोस्तों से गुजराती में ही बात करता हूं। जो पढ़े-लिखे हैं, उनका भी अंग्रेजी का लहजा अच्छा नहीं है। वैसी अंग्रेजी पर कई तरह के लतीफे ही चलते हैं। गुजरात को अंग्रेजी की जरूरत नहीं है, क्योंकि यहां का समृद्ध वर्ग व्यापार करता है। अपने बचपन के दोस्तों में मैं ही अकेला ऐसा हूं, जो नौकरी करता हूं। उच्च वर्ग के लोगों को नौकरी चाहिए भी नहीं, केपीएमजी की रिपोर्ट में कम तनख्वाह की बात भी स्वीकार की गई है। अंग्रेजी का ज्ञान न होने के कारण मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में गुजराती मध्य वर्ग नहीं है। यहां अंग्रेजी अखबार पढ़ने वाले संभ्रांत लोग नहीं हैं। इसी वजह से निम्न मध्य वर्ग से ऊपर उठने का सिलसिला भी नदारद है। मुझे तो लगता है कि अगर गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की कट्टरता के खिलाफ कोई बौद्धिक प्रतिरोध नहीं होता है, तो उसका भी यही कारण है। अंग्रेजी का ज्ञान न होने से वैचारिक समृद्धि भी ज्यादा नहीं हुई है।

यह शिक्षा से जुड़ी समस्या है। नरेंद्र मोदी ने इसके लिए क्या किया? साल 2002 में उन्होंने बताया था कि वह नया पाठय़क्रम शुरू कर रहे हैं, जिसमें बच्चे कुछ विषय अंग्रेजी में पढ़ेंगे और कुछ विषय गुजराती में। लेकिन अंग्रेजी भाषा कक्षा आठ में आई। बाद में यह कक्षा पांच में आ पाई। लेकिन यह भी बहुत देर है, क्योंकि बच्चा दस साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते भाषा को पकड़ चुका होता है, तब नई भाषा को ग्रहण करना इतना आसान नहीं रह जाता। वर्ष 2009 में अहमदाबाद के एक अखबार ने अपनी पड़ताल में पाया था कि गुजरात बोर्ड परीक्षा में दसवीं पास करने वाले छात्रों की टॉपर लिस्ट में 32 नाम थे, लेकिन उसमें से एक भी अंग्रेजी माध्यम का छात्र नहीं था।

मोदी अंग्रेजी को एकदम नीचे से क्यों नहीं शुरू करते? वह ऐसा चाहते थे, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रोक दिया। उनकी जो लोकप्रियता है, उसे देखते हुए उन्हें आरएसएस को इसके लिए राजी करना चाहिए था। कांग्रेस भी अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन करती है। इसके नेता अर्जुन मोढवाड़िया मानते हैं कि इससे गुजरातियों का भला होगा। लेकिन नरेंद्र मोदी ने इस पर जोर नहीं दिया। अगस्त में केंद्र सरकार ने गुजरात और कुछ दूसरे राज्यों की इस मांग को मान लिया कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा को छात्र गुजराती और दूसरी भाषाओं में भी दे सकेंगे। फिर खबर आई कि गुजराती में न तो इसके विषयों को पढ़ने की सामग्रियां उपलब्ध हैं और ही अध्यापक इसके लिए तैयार हैं।

मोदी के पास वित्त, गृह, उद्योग, ऊर्जा, पेट्रो-केमिकल्स, खनन जैसे ढेर सारे महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं। लेकिन शिक्षा मंत्रालय को उन्होंने अपने पास नहीं रखा। शिक्षा मोदी की प्राथमिकता सूची में है भी नहीं। इसके लिए कड़ी मेहनत और मौलिक चिंतन की जरूरत पड़ेगी, इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से टकराना भी पड़ेगा। जब आरएसएस का दबाव पड़े, तो किसी दूसरे मंत्रालय को देने की बजाय अंग्रेजी के नाम पर समर्पण उनके लिए आसान भी है। वाइब्रेंट गुजरात पर जोरदार भाषण देना तो आसान है। इसी तरह, 15 फीसदी विकास दर की बात करना भी आसान है। लेकिन उन्हीं की वजह से यह विकास दर हासिल नहीं हो पा रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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टिप्पणियाँ
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टिप्पणियॉ पढ़े(2)
श्री ओंकार पटेल जी आपका ये लेख पूरी तरह अँग्रेजी मानसिकता से प्रेरित हुआ प्रतीत हो रहा है। आपका यह कहना की ‘अंग्रेजी का ज्ञान न होने से वैचारिक समृद्धि भी ज्यादा नहीं हुई है’ घोर आपत्तीजनक है। किसी भी क्षेत्र के विकास में वहाँ की सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। अगर इस विषय में विस्तार से विमर्श करना चाहते हैं तो मैं आपको पत्राचार करूंगा।
By Umakant Gond (19th-December-2012 02:46:PM)
Shri Akar Patal ji app k vchar s es bat k pusti hoti h ki gujrat bina english k b apna vikas puri traha s kar raha
By R.K.Agarwal (19th-December-2012 09:07:AM)
 
 
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