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जब तक कुरसियां नहीं हिलेंगी, कुछ नहीं होगा
वर्तिका नंदा, पत्रकार व लेखिका First Published:18-12-12 10:08 PM

फेसबुक पर नाराजगी, वसंत विहार थाने व अस्पताल के बाहर आक्रोश और चेहरा छिपाते सरकारी व राजनीतिक खिलाड़ी। इन सबके बीच एक वह लड़की, जो अपराधियों के हत्थे चढ़ी, जाने अपनी उतरती-चढ़ती सांसों के बीच किन एहसासों के बीच गुत्थम-गुत्था होती रही होगी। दिन भर मेरा मन यह सब सोचकर परेशान रहा।

मेरा सवाल सीधा है- क्या हमें महिला आयोग जैसे चिंता जताने वाले आयोगों की जरूरत है? क्या हम अपराध से जूझने के लिए तैयार हैं? क्या हम अपराध को लेकर संवेदनशील हैं? कल एक अपराध हुआ- जघन्य, दुखद व बेहद शर्मनाक! देश की संसद में बहस हुई है। सुषमा स्वराज, मायावती और जया बच्चन जोरदार तरीके से बोलती दिखीं। पर हर बार ऐसा होता है। पीड़िता पुलिस और आयोगों के पास जाती हैं, तब उनका साथ कौन देता है? क्या पुलिस उस पर तुरंत कार्रवाई करती है? हमारा कथित पेज थ्री समाज तब भी चुप रहता है। वह व्यस्त रहता है। और पीड़ित लड़की हमेशा के लिए एक ऐसा युद्ध हार जाती है, जिसकी न तो उसने शुरुआत की थी और न ही जिसके लिए वह जिम्मेदार है।

चलती बस में लड़की से बलात्कार हुआ। बस पूरी दिल्ली में घूमती रही। वह लड़की जरूर चिल्लाई होगी, उसका दोस्त भी चीखा होगा, पर किसी को उनकी आवाज नहीं सुनाई दी। ऐसे अपराध करने वालों में इतना दुस्साहस कहां से आता है? वे मानकर चलते हैं कि कुछ नहीं होगा। वे उन तस्वीरों पर विश्वास करते हैं, जो उन्हें दिखती हैं। संसद में पहुंचते अपराधी, आसानी से जिंदगी में जीत जाते अपराधी। समाज चुप रहता है। घटना से पहले आवाजें कहां चली जाती हैं? किसी को सुनाई नहीं पड़तीं। घटना के बाद एकाएक दिखती है सक्रियता। छात्र, अध्यापक, महिला कार्यकर्ता, लेखक। एक जोरदार आवाज उठती है। यह भी साफ है कि इस सोती हुई व्यवस्था के बीच अगर मीडिया न होता, तो शायद घटना के बाद भी कुछ न होता। शुक्र है कि एक जीवंत मीडिया है हमारे पास। अब जो आवाज उठी है, उसमें और आवाजों को जोड़ने का समय है। कानून या सरकार से उम्मीद बीते समय की बात हुई। अब वह करना होगा, जो किसी भी देश के सभ्य और ताकतवर समाज को करना चाहिए। सामाजिक बहिष्कार। अपराधी को जब तक समाज अलग-थलग नहीं करेगा, अपराधी बसों में बलात्कार व घर के अंदर घरेलू हिंसा करते रहेंगें व अदालतों के बाहर मुस्कुराते हुए मिलेंगे।

यही समय है एकदम जोरदार तरीके से किसी एक्शन को लाने का। यह दबाव भी डालने का कि कम से कम कुछ जिम्मेदार लोग इस्तीफे जरूर दें। अब हमें बेहतर पुलिस चाहिए, बेहतर महिला आयोग, बेहतर समाज। बेहतर समय और घटना को परिणाम तक लाए बिना चैन न लेने वाला बेचैन मीडिया। जब तक कुछ कुरसियां हिलेंगी नहीं, कुछ होगा नहीं। एकदम नहीं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 
 
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