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संदेह की पहेली
लाजपत राय सभरवाल
First Published:18-12-12 10:06 PM
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संदेह एक अजीब कशमकश है। जिससे संदेह किया जाता है, उसके साथ रहना भी पड़ता है और जिसके साथ रहते हैं, उसे संदेह की दृष्टि से भी देखते है। अजीब-सी स्थिति होती है। संदेह कोई अविश्वास नहीं है। अविश्वास में किसी को मानने-अपनाने से साफ इनकार किया जाता है। संदेह पूरी तरह से नकारता भी तो नहीं है। इसे विश्वास भी कैसे कहें? संदेह से भरा मन भला मानता ही कब है? संदेह में मन न तो मानता है और न ही स्वीकारता है। संदेह कहता है कि ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी। यह घड़ी के पेंडुलम के समान इधर-उधर डोलता रहता है, कहीं ठहरता नहीं। ठहर जाने पर तो संदेह रह भी नहीं जाता है। संदेह एक विचित्र मानसिक समस्या है, जिसमें परिणाम व निष्कर्ष का सर्वथा अभाव होता है। संदेह उपजता है, अपने ही मन के किसी कोने से और बढ़ते-विकसित होते हुए औरो में पसर जाता है।

सबसे पहले हम अपने आप पर संदेह करते हैं। हम अपने ही मन के अवसर पर या किसी से मिलते समय यह भरोसा नहीं रहता कि हमारा मन अपने विचारों पर अडिग रहेगा, डिगेगा नहीं। इस उधेड़-बुन में ही संदेह का बीज पड़ जाता है, जिसे हम सतत पोषण देते रहते हैं और यह हमारे व्यक्तित्व का अखंड व अविभाज्य अंग बन जाता है।

संदेह का समाधान है? हम संदेह की शुरुआत बुरे से करते हैं। संदेह अच्छे से प्रारंभ करना चाहिए। कई ऋषियों ने भी संदेह किया था। उन्होंने ईश्वर पर संदेह किया था। दार्शनिक दे कार्ते ने अपना दर्शन संदेह से ही प्रारंभ किया है। उनके अनुसार, यदि हम संदेह करते हैं, तो अपने अस्तित्व को स्वीकारते हैं। संदेह करने वाला कोई है, जो किसी पर संदेह कर रहा है। अगर हम नहीं हैं, तो संदेह किस पर करें, किसका करें? संदेह करने वाला अनायास स्वयं को स्वीकारता है और साथ ही उसे भी मानता है कि कोई है, भले ही वह अस्पष्ट व धुंधला है।

 
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