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यहां से शुरू होगी तरक्की की राह
सुधीन्द्र भदौरिया, बसपा नेता First Published:17-12-12 10:41 PM

देश को जाति प्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने आजादी की लड़ाई के दौरान जन अभियान चलाया था। उसमें उन्होंने यह स्पष्ट कहा था कि जो सामाजिक समूह हजारों वर्ष से गुलामी का जीवन जी रहे हैं, उन्हें मुक्ति दिलाए बिना आजादी का कोई अर्थ नहीं होगा। बल्कि ऐसी आजादी तो केवल आभिजात्य वर्ग के लिए होगी। उन्होंने इस विचार को अपनी पुस्तक ऐनिहीलेशन ऑफ कास्ट में साफ-साफ लिखा है कि जब तक जाति व्यवस्था, जो हजारों वर्षों का रोग है, समाप्त नहीं होती, तब तक न्याय और भाईचारे पर आधारित  सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। आजादी के दौरान बाबा साहब ने ये विचार लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के लिए लिखे थे और यह आज देश की धरोहर है। दलित समाज  और अनुसूचित जनजाति के लोग यह मानते हैं कि जाति के शिकंजे को खत्म किए बिना कोई राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता। इसलिए अब यह आवाज पूरे देश में बुलंद हो रही है और संसद से लेकर सड़क तक, इस पर चर्चा हो रही है। सबको एक समान अवसर उपलब्ध कराने का तर्क देने वाले लोग और पदोन्नति में आरक्षण विरोधी यह मानते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवार नौकरी में बिना योग्यता के आ जाते हैं।

संविधान में आरक्षण का प्रावधान बाबा साहब के ठोस व कड़े विचारों की वजह से समाहित किए गए, और इसकी आधारशिला पूना पैक्ट के जरिये रखी गई थी। आजादी के दौरान जब पूरे देश में माहौल गरम था, तब पूना पैक्ट के जरिये देश के लोगों को बाबा साहब ने विश्वास दिलाया था कि आरक्षण का सिद्धांत लागू किया जाएगा, जिससे आगे जाकर हम जाति व्यवस्था को समाप्त कर सकेंगे। इसलिए अगर दलितों व अनुसूचित जनजाति को आरक्षण मिला है, तो देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मिला है। आरक्षण का सिद्धांत कोई दान नहीं है, बल्कि दलित व अनुसूचित जनजाति के लोगों का अधिकार है।

वैसे भी इन तबकों के लोग आर्थिक व सामाजिक तौर पर समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे हैं। ये ज्यादातर खेतिहर मजदूर हैं या फिर सीमांत किसान हैं। अनुसूचित जनजाति के लोगों से जंगल, जमीन और जल के अधिकार छिन चुके हैं। विकास के नाम पर वे अपने इलाके छोड़कर भटक रहे हैं। कॉरपोरेट जगत हों या अन्य सरकारी योजनाएं हों, उन्हें इनमें समाहित ही नहीं किया जाता। आज इनका पूरा इलाका नक्सलियों के लाल गलियारे के तौर पर पूरे देश में कुख्यात हो चुका है। इस तरफ न सरकार का ध्यान जा रहा है, और न ही विकास कार्य में लगी एजेंसियों की तरफ से कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। अब लोग आरक्षण का अधिकार भी उनसे छीनने में लगे हुए हैं।

सरकार ने स्वयं माना है और मंत्री ने संसद में स्वीकार किया है कि भारत सरकार में सचिव पद पर बैठे 88 लोगों में एक भी दलित अधिकारी नहीं है। इसके अलावा 66 अतिरिक्त सचिव हैं, जिनमें केवल एक दलित है। केंद्र के सरकारी विभागों में संयुक्त सचिव के 249 पद हैं, जिनमें से मात्र 31 पर दलित अधिकारी तैनात हैं। अगर दलित और अनुसूचित जनजाति के लोगों की जनसंख्या 25 प्रतिशत के आसपास है, तो फिर सरकारी पदों में उनकी भागीदारी इतनी खराब क्यों है? यह बात इसके विरोध में खड़े लोग कभी क्यों नहीं सोचते?
देश को आजाद हुए 65 वर्ष बीत चुके हैं। इसके बावजूद राष्ट्र के संचालन में इतनी कम भागीदारी पर विरोधियों के मन में कोई वेदना और दर्द नहीं है। अगर उनकी भागीदारी थोड़ी-बहुत कहीं दिखाई देती है, तो तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों में। क्या यह शर्म की बात नहीं कि इन्हें सिर्फ तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के स्तर पर ही पूरे अवसर मिले हुए हैं? शिक्षा जगत, पत्रकारिता, फिल्म और निजी संस्थानों में तो और भी बुरा हाल है। उदाहरण के तौर पर, 1,864 प्रोफेसरों में से केवल 25 ही दलित व अनुसूचित जनजाति से आते हैं, एसोसिएट प्रोफेसर के 3,533 पदों में इनकी भागीदारी 61 है। असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर बैठे लोगों में भी यही स्थिति है। इससे समझा जा सकता है कि हाल कितना बुरा है। ये आंकड़े बताते हैं कि उन्हें एक हद दे दी गई है, जिससे ऊपर वे उठ नहीं सकते।

आज पूरे देश को उनकी इस वेदना को पहचानना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों के पीठ ने इस बात को स्वीकारा था कि इस तबके के लोग पिछड़े हैं और संविधान की धारा 341 भी यही कहती है। पर नागराज के केस में अदालत ने यह जरूर कहा समुचित आंकड़ा होना चाहिए। इस तरह की प्रक्रिया अगर चलाई जाए, तो यह काफी लंबा समय लेगी। जिससे इन तबको का काफी नुकसान होगा और उनमें अलगाव की भावना भी फैल सकती है।

राज्यसभा में सरकार ने पदोन्नति में आरक्षण का जो संविधान संशोधन प्रस्ताव पेश किया था, उस प्रस्ताव को हमें इसी संदर्भ में देखना चाहिए। हालांकि इसमें छोटे-मोटे संशोधन भी पेश किए गए, पर कुछ राजनीतिक दल इसका विरोध करने पर अंत-अंत तक अड़े रहे। संसद में ही नहीं, बाहर भी उन्होंने इसका विरोध किया। इसके लिए अब तो हड़ताल जैसे हथकंडे भी अपनाए जाने लगे हैं। बहरहाल, ऐसे लोगों को राम मनोहर लोहिया की पुस्तक जाति प्रथा पढ़नी चाहिए। समान अवसर बनाम विशेष अवसर के राम मनोहर लोहिया के तर्क को समझने का यही वक्त है। तभी वे इसका विरोध छोड़ सकेंगे। देश के लिए जरूरी है कि यह संविधान संशोधन प्रस्ताव कानून की शक्ल ले। देश की तरक्की का रास्ता इसी से निकलेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
 
 
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