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मुलायम की विक्टोरिया बग्घी अंबेडकर पार्क से जौहर विश्वविद्यालय जा रही है14 किलोमीटर का सफर लगभग तीन घंटे में पूरा होगाजगह जगह से फूल बरसाए जा रहे हैं
प्रयोगों को बढ़ावा दीजिए देश की सूरत संवरेगी
किरण मजूमदार शॉ, प्रसिद्ध उद्योगपति First Published:17-12-12 10:40 PM

मैं खुद को एक ऐसी उद्यमी बताती हूं, जो दुर्घटनावश इस क्षेत्र में आई। साल 1975 में मैं ऑस्ट्रेलिया से ‘ब्रिउ मास्टर’ बनने की अपनी पढ़ाई पूरी करके लौटी थी, लेकिन जब ऐसा हो न सका, तो मेरे आयरिश पार्टनर ने मुझे उद्यमिता के क्षेत्र में धकेल दिया। एक 25 साल की युवती को अपना कारोबार शुरू करना था, जाहिर है, मुझे साख से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का मुकाबला करना था।

बायोकॉन की नींव रखने और उसे मजबूत करने के मेरे सफर की शुरुआत बायो-टेक्नोलॉजी के अपने ज्ञान, नए-नए प्रयोगों और अनेक तरह की दैनिक चुनौतियों से निपटने के साथ हुई। एक उद्यमी के तौर पर मेरा ध्यान इनोवेशन पर आधारित बिजनेस मॉडल पर केंद्रित था। और मेरा मानना था कि कुछ खास करने का बेहतर रास्ता है कि उसे रचनात्मक तरीके से किया जाए। मैं हमेशा से भारतीय वैज्ञानिकों के लिए कैरियर के मौके पैदा करना चाहती थी, जो अमूमन अपना भविष्य देश के बाहर तलाशने को मजबूर थे। मैं यह भी चाहती थी कि अपने देश में विश्व स्तर की गुणवत्ता वाली दवाओं का उत्पादन कर सकूं। बहरहाल, एक उद्यमी के तौर पर अपनी इस यात्रा में मैंने विफलताओं का खूब स्वाद चखा, उनका मुकाबला किया और उनसे गहरे सबक सीखे। अपनी इस क्षमता की बदौलत ही मैं नाकामयाबियों को पीछे छोड़ आगे बढ़ सकी। नाकामियां जो तजुर्बा देती हैं, कामयाबी वैसी सीख, वैसे अनुभव आपको कभी नहीं दे सकती। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप विफलताओं की दुआ मांगें, लेकिन जब नाकामी सामने खड़ी हो, तो उसके आगे हमेशा के लिए समर्पण करने की बजाय उससे टकराइए और सबक सीखिए। मेरी निजी यात्रा मूल्य गढ़ने की रही है। मेरे लिए संपत्ति का मतलब मूल्य है और मेरा पूरा ध्यान इसी पर होता है कि मैं अपने कारोबार में कितना मूल्य जोड़ सकती हूं। बायोकॉन को लेकर मेरा नजरिया है कि आने वाले कुछ वर्षो में हम अरबों डॉलर की कंपनी बनें। हमें भरोसा है कि हमारी एक दवा हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में नया मुकाम दिलाएगी।

स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास व पर्यावरण आदि के क्षेत्र में आज हमारे सामने जो आर्थिक चुनौतियां खड़ी हैं, वे साहसिक कदम उठाने की मांग करती हैं। आर्थिक तौर पर संपन्न और सामाजिक रूप से एक बेहतर मुल्क बनने की भारत की क्षमता तभी साकार रूप ले सकती है, जब हम इनोवेशन को फलने-फूलने के भरपूर मौके देंगे और इसके लिए हमें उद्यमिता को प्रोत्साहित करना होगा। हमारे देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, बल्कि हमारे पास विश्व स्तर के दक्ष नौजवानों का भंडार है। संसाधनों व प्रतिभाओं से भरपूर भारत में उद्योगों के लिए उर्वर भूमि है। ये कुशल लोग नई-नई चीजें उत्पादित करके चुनौतियों को अवसर में तब्दील कर सकते हैं। इससे न सिर्फ करोड़ों लोगों को लाभ होगा, बल्कि देश के आर्थिक विकास को भी नई रफ्तार मिल सकेगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 

 
 
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