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पापा, आप नहीं समझोगे
अशोक सण्ड First Published:17-12-12 10:40 PM

बच्चनजी को याद कर सदी के महानायक जब अपने ‘बाबूजी’ की रचनाओं का पाठ करते हैं, तब सहसा कौंध जाता है कि वन्स अपॉन अ टाइम हिंदी बेल्ट में फादर को बाबूजी, पिताजी, बाउजी,अब्बा, वालिद पुकारने का रिवाज था। महाभारत के टीवी संस्करण ने फादर को शॉर्ट टाइम के लिए ‘पिताश्री’ जरूर बनाया, पर चहुंओर अब पापा का ही बोलबाला है।अलबत्ता आधुनिक घरानों में पापा या तो ‘पा’ बन गए या फिर ‘डैड’ की गति को प्राप्त हैं।

अंग्रेजी के फादर को हिंदी में बाप कहते हैं। फादर थोड़ा सफिस्टीकेटेड है, इस वजह से आज के दुलत्ती-मय युग में लात खाने से बचने के लिए मौका मुताबिक ‘बाप’ ही बनाए जाते हैं। फादर दो प्रकार के होते हैं। पहला जो जन्म देता है, अर्थात ‘बायोलॉजिकल फादर।’ दूसरा, जो किसी पाणिग्रहण करते ही ओरिजिनल को आउट कर कानूनन ‘इन’ हो जाता है। फादर-इन-लॉ।

बेचैन-हांफती जिंदगी में चैन की बंसी बाप भरोसे ही बजाई जा सकती है। कहा भी गया है-बड़े बाप के बेटे हैं, जब से जन्मे लेटे हैं। ऐसे सपूत ही फंस जाने पर ललकारते हैं, ‘शायद तुम नहीं जानते मेरा बाप कौन है..।’ पूरा घर अपने अंदर समेटे बाप घर का दरवाजा होते हैं। बाप छत होते हैं आसमान के विरुद्ध। अभेद्य दीवार होते हैं, खतरों के सामने। वेदना, विस्मय की मनोदशा में बाप ही याद आते हैं.. अरे बाप रे!

बेटे के परफॉर्मेस पर ही टिकी रहती है बाप की हैसियत। बेटा लायक, तो क्रेडिट उसकी मेहनत को। बिगड़ जाए, तो बाप जिम्मेदार। बेटे को गद्दीनशीं करने वाले अधिकतर बाप मुलायम किस्म के होते हैं। सख्त बाप बेटे की मोहब्बत को दीवार में चुनवा देते हैं।

अबूझ पहेली ‘कटोरे पे कटोरा..’ जीवन सूत्र हैं अब। दर्जी से सिले कपड़े पहनने, खजूर छाप घी खाने वाले बापों की ब्रांडेड कपड़े पहनने व कांटीनेंटल भोजन करने वाली संतानें ‘सुपर गोरी’ हैं। सीटी न बजा पाने वाले बाप के बेटे शंख बजा रहे हैं। अत: ‘पूज्य पिताजी’ से ‘माई डियर पापा’ की गति को प्राप्त बापों सावधान! पुराने मूल्यों और संस्कारों का हवाला दिया तो कदाचित सुनना पड़ेगा..‘पापा, आप नहीं समझोगे..।’

 
 
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