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दुखड़े का सहारा क्यों
रेनू सैनी
First Published:17-12-12 10:13 PM
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अक्सर लोग अपनी कमियों का दुखड़ा रोते हुए मिल जाएंगे। मैं दिखने में अच्छा नहीं हूं, मेरा कद छोटा व रंग काला है, मैं अक्सर बीमार रहता हूं, मुझे कुछ समझ में नहीं आता, वगैरह। उन्हें लगता है कि अपनी कमियों और परेशानियों का बखान करके वे सामने वाले की सहानुभूति हासिल कर लेंगे। यह सोचकर उन्हें सुकून मिलता है। यही सुकून उनका सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। हकीकत यह भी है कि जो व्यक्ति अपने दुखड़े का सहारा लेते हैं, वे जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते। जो व्यक्ति कमियों के बावजूद आत्मविश्वास का सहारा नहीं छोड़ते, उन्हें जीत हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता। सेमुअल जॉनसन कहते हैं कि ‘आत्मविश्वास किसी भी महान काम की पहली आवश्यकता है।’ जीवन में आगे बढ़ने की और सफलता हासिल करने की पहली शर्त यही है कि व्यक्ति खुद को किसी भी हालात में कमजोर व मजबूर न समझे और न ही कभी दूसरों के सामने दुखड़ा बनकर प्रस्तुत न हो। कई अशक्त और विकलांग व्यक्ति भी अभूतपूर्व जीत हासिल करके इतिहास रच देते हैं, फिर सामान्य व्यक्ति यदि दुखड़ा रोते रहना चाहता है, तो इसका अर्थ यही है कि वह वास्तव में सामान्य नहीं है।

दूसरों से सहानुभूति हासिल करके अपनी कमजोरियों पर परदा डालने की चाहत में कुछ समय बाद ऐसे लोग वास्तव में शारीरिक और मानसिक रूप से हर कार्य में असमर्थ हो जाते हैं। मोलिक्यूल्स ऑफ इमोशन की लेखिका कैंडस पर्ट का कहना है कि भावनाएं उस पुल के समान हैं, जो सिर्फ दिमागी ही नहीं, पूरे शरीर में मौजूद रहती हैं। वे हमारे सारे सिस्टम को नियंत्रित करती हैं। भावनाएं पाचन तंत्र, हारमोन सिस्टम, हृदय की धड़कन और रोग प्रतिरक्षा प्रणाली पर सीधा असर डालती हैं।’ इस तरह के लोग न जीवन में प्रगति कर पाते हैं और न ही शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रह पाते हैं। इसलिए आगे बढ़ना है, तो दुखड़े को छोड़ना होगा।

 
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Image Loadingकाला धन करदाताओं को देंगे,एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में मोदी ने कहा
नरेन्द्र मोदी से ‘हिन्दुस्तान’ ने ई-मेल के जरिए उनसे जुड़े तमाम विवादों और सवालों पर सीधे सवाल किए। जवाब भी वैसे ही मिले...सपाट पर बेहद संयत। वे कठिन परिश्रम का वादा कर देश को आगे बढ़ाने की इच्छा जताते हैं।
 

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