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अन्ना की बची-खुची राजनीति की दिशा
गिरिराज किशोर, वरिष्ठ साहित्यकार First Published:16-12-2012 10:55:09 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति के अन्ना हजारे के आंदोलन ने देश पर जादू-सा असर किया था। गांधीजी के बाद पहली बार एक सामाजिक बुराई के विरुद्ध इतना बड़ा मोर्चा खुला था। लोगों को लगा अन्ना हजारे आ गए हैं, तो देश का भाग्य बदलेगा। हर आदमी ‘मैं अन्ना हूं’ की टोपी लगाए घूम रहा था। उन्होंने जब उपवास किया, तो दिल्ली ही नहीं, पूरा देश सहयोग देने के लिए उतावला हो उठा था। कहा जाता है कि तब कचहरी में काम करने वाले कर्मचारियों तक ने घूस लेना बंद कर दिया था। सरकार सुबह लिया गया निर्णय शाम को बदलने के लिए बाध्य हो गई थी। बचपन में देखा था, गांधी के उपवास पर तो देश की सांस रुक जाती थी। इस बार भी बदलाव की सुरसुराहट चारों तरफ महसूस हो रही थी। लगने लगा था कि भ्रष्टाचार में ऊपर माना जाने वाला हमारा देश अब ईमानदारी में आगे आने के लिए बेचैन हो उठा है।

जब अन्ना मेदांता में दाखिल हुए, तो लोग असहज हो गए थे। जागरूकता का वह क्षण अचानक रुक गया। अन्ना ठीक होकर अपने गांव गए, तो लगा इस बार वह तरोताजा होकर लौटेंगे। जंग फिर चालू होगी। वातावरण जो बना था, वह अफवाहों से भरने लगा और दरार पड़ने लगी। हम सब जो उनके साथ खड़े थे, उन्हें खालीपन-सा लगने लगा। इस बीच एक सवाल दिमाग में आया कि भ्रष्टाचार का मुद्दा मुख्य है या लोकपाल? इतने विभाग भ्रष्टाचार रोकने को लिए लगे हैं, पर भ्रष्टाचार है कि रुक ही नहीं रहा। लोकपाल भी उनमें से एक विभाग हो जाएगा। यह सवाल मुझे कई दिनों तक परेशान करता रहा कि भ्रष्टाचार इतना व्यापक विषय है, उसे एक लोकपाल में समेट देना क्या सही है? भ्रष्टाचार फसल में लगने वाले उस कीट की तरह है, जो फसल को भी खोखला कर देता है और जमीन को भी। जड़ों में बीमारी फैलती है और पत्ते और दाने, दोनों शिकार हो जाते हैं। अच्छा किसान पत्तों और दानों की रखवाली पहले नहीं करता, वह जड़ों में लगे कीड़े को मारता है। क्या लोकपाल जड़ों को शुद्ध करने का माध्यम है? इतने व्यापक मानसिक और सामाजिक रोग को क्या लोकपाल रोक देगा? वह भी दंडात्मक फैसला करने वाले कोर्ट-कचहरी की तरह एक विभाग होगा। मैं यहां गांधीजी का जिक्र करना चाहता हूं। वह हर सामाजिक बीमारी की जड़ तक जाने की कोशिश करते थे। भ्रष्टाचार भी हिंसा की तरह मानसिक रोग है। उसका इलाज रोग के अनुरूप होना चाहिए। कोई जेल या कानून या सजा- गुनाह का उन्मूलन नहीं कर पाएगा। अलबत्ता, ऐसे उदाहारण हैं, जब हिंसा का अंत अहिंसा द्वारा मन बदलने से हुआ। अंगुलीमाल और बुद्ध का प्रकरण इसका उदाहरण है। साल 1947 के बंगाल दंगों में गांधी के उपवास ने सोहरावर्दी का मन बदल दिया था।

भ्रष्टाचार का मुद्दा गुलामी की तरह ही व्यापक मुद्दा है। हिंसा-सा मनोभाव भ्रष्टाचार के मूल में है, प्रवृत्तिमूलक। इससे लड़ने के लिए दंडात्मक कम संवेदनात्मकता का प्रयोग अधिक आवश्यक है। पहली खेप का अन्ना आंदोलन इस दृष्टि से अधिक प्रभावी साबित हुआ था। अधिकतर लोग आश्वस्त थे कि रिश्वत लेना-देना समाज के लिए अहितकारी हैं। मैंने पहले भी उल्लेख किया है कि कचहरी तक में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों ने तारीख देने के लिए या फाइल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए हथेली गरम करने की मानसिकता से निजात पाना शुरू कर दिया था। लेकिन यह अधिक दिन नहीं चला। अन्ना के स्वास्थ्य के कारण पहले तो उनका जादू टूटा। फिर उन्होंने सिविल सोसाइटी की संचालन कमेटी भंग की। इस बीच न कोई आंदोलन हुआ, न भूख-हड़ताल। सन्नाटा रहा। बाद में अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने अनशन किया। लोग जुटे, पर मन में शंका लिए रहे कि आखिर अन्ना इससे क्यों अलग हैं? किरण बेदी का एग्जीक्यूटिव क्लास का भत्ता लेकर किफायती क्लास में सफर करना और यह बताना कि अधिक लिए पैसों को लोगों की भलाई पर खर्च कर देती थीं, सिविल सोसाइटी पर बट्टा था। एक आईजी रैंक की अफसर यह तर्क कैसे दे सकती थी, जबकि यह स्पष्ट नियम है कि जिस क्लास में सफर करते हैं, उसके बारे में यह सर्टिफिकेट दिया जाना अनिवार्य होता है कि उसने अमुक क्लास में सफर किया है? वही उसकी ईमानदारी का प्रमाण है। अन्ना को उससे कोई ऐतराज नहीं, पर केजरीवाल से है। राजनीति में कोई बिना आकांक्षा लिए नहीं आता। भले ही वह आकांक्षा सेवा या यश की हो।

केजरीवाल के बारे में अन्ना हजारे ने तीन बार बयान बदले। उनके मन का संकल्प-विकल्प उसमें साफ नजर आता है। अन्नाजी के साथ जो बैठक विट्ठल भाई पटेल भवन में हुई थी, उसमें मैं भी उपस्थित था। मैंने वहां कहा था कि अन्नाजी बहुत बड़े व्यक्ति हैं, उन्होंने महाराष्ट्र में परिवर्तन की लंबी इबारत लिखी है, लेकिन उत्तर भारत में जन-जन तक उनके पहुंचने में केजरीवाल और उनके साथियों का हाथ है। 12 दिसंबर के अखबार में अन्ना का यह कथन है कि अगर केजरीवाल के बारे में वह वास्तविकता बता देंगे, तो वह मुश्किल में पड़ जाएंगे। सियासत में तो यह सब होता है, पर सामाजिक आंदोलन परस्पर विश्वास पर चलते हैं। अन्ना ने उसी पहली मीटिंग में कहा था, हम दोनों का उद्देश्य एक है, रास्ते अलग हैं। पर वह अपना समर्थन केजरीवाल की सिविल सोसाइटी द्वारा खड़े किए गए ईमानदार उम्मीदवारों को देंगे। कुछ ही दिन पहले अन्ना ने कहा कि वह केजरीवाल के उम्मीदवारों का ही समर्थन करेंगे। लेकिन अब उनका वह स्टैंड बदल गया है। उन्होंने केजरीवाल को बिना कारण बताए अपमानजनक ढंग से अस्वीकार कर दिया। यह या तो किसी अंदरूनी कलह अथवा लगाई-बुझाई के कारण हुआ है या फिर अन्य गोपनीय कारण हैं। अन्ना का बार-बार अपना रुख बदलना भ्रष्टाचार के उन्मूलन के हक में नहीं है। अगर अन्ना समझते हैं कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, तो सवाल है कि वह अपने लिए है या देश के हित में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए? राजनीतिक आकांक्षा तो उसी बिंदु से शुरू हो जाती है, जब हम व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं। उसका लाभ अगर स्वयं नहीं लेते, समाज को देते हैं, तो उसे निखालिस राजनीतिक महत्वाकांक्षा कहना क्या उचित है?

केजरीवाल भ्रष्टाचार को सामने लाने का जमीनी काम कर रहे हैं। अगर अन्ना व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं, तो वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचार मूलक तथ्यों को सामने लाए बिना परिवर्तन की कल्पना करना व्यर्थ होगा। लेकिन यह भी जरूरी है कि जिस मामले को उठाया जाए, उसे किसी नतीजे पर पहुंचना भी चाहिए। व्यवस्था परिवर्तन तभी संभव है। एक काम को केजरीवाल अंजाम दे रहे हैं, दूसरे का सवाल अभी बचा हुआ है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
 
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