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कम अपराध के आकड़ों में उलझी व्यवस्था
दिनेश पाठक, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, कानपुर
First Published:16-12-12 10:54 PM
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तब चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे व एन एस सक्सेना आईजी, पुलिस। पुलिस तब भी मुकदमे दर्ज करने के प्रति बेहद लापरवाह थी। जब सक्सेना साहब को पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी मिली, तो उन्होंने आदेश दिए कि जितने भी फरियादी थाने आएं, उनके मामले जरूर दर्ज किए जाएं। पुलिस ने मुकदमा दर्ज करना शुरू किया, तो राज्य में हो रहे अपराध दस्तावेजों में आए और सही सूरत दिखने लगी। मुख्यमंत्री ने आईजी को बुलाकर पूछा, तो उन्होंने सच बताकर संसाधन बढ़ाने की मांग की। मांगें मानी भी गईं। लेकिन अब न चौधरी चरण सिंह रहे, और न एन एस सक्सेना।

पुलिस अफसर हों या शासन में बैठे आईएएस, कम पुलिस बल के बावजूद बेहतर कानून-व्यवस्था के दावे से कोई परहेज नहीं करता। यह सब बेहतरीन इसलिए दिखाई दे रहा है कि पुलिस अपराध को दर्ज करने से परहेज करती है। गंभीर अपराध को हल्की धाराओं में दर्ज करना उसकी फितरत में शामिल है। सबको पता है  कि जमीनी असलियत दर्ज नहीं हो रही। दर्ज वही मामले हो रहे हैं, जो अफसरों के लिए सुविधाजनक हैं। यह सब इसलिए हो रहा है कि आला अफसर अपराध की समीक्षा करते समय भी सच का सामना करने को तैयार नहीं हैं। हर हाल में अपराध पिछले साल से कम दिखना चाहिए। बढ़ा, तो खैर नहीं। उनकी साख इन्हीं आंकड़ों से जुड़ी है। थानेदार से लेकर डीएसपी, एसपी, डीआईजी तक के मन को यही भाता है।

कोई यह नहीं सोचता कि अपराध छिपाकर वह कैसे समाज की रचना करना चाहता है। हकीकत में जितने अपराध हो रहे हैं, उनके दर्ज होने से लगेगा कि अचानक बाढ़ आ गई। सच यह है कि इसका फायदा असल में किसी को नहीं मिल रहा। सरकार को भी नहीं। हां, क्षण भर के लिए उन अफसरों को जरूर लाभ दिखता है, जिनके लिए यह कुरसी बचाने का शॉर्टकट है। हां, अपराधियों को इसका सीधा फायदा जरूर मिल रहा है।
रास्ता एक ही तरह से निकल सकता है। बस यह तय करना होगा कि अपराध के आंकड़े बढ़ने पर किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। अलबत्ता, अपराधियों के न पकड़े जाने पर सजा जरूर मिलेगी। सच सामने आने पर पुलिस विभाग पर काम के बोझ को समझने में भी सरकार को सुविधा होगी। पुलिस बल का विस्तार, संसाधनों का विकास आदि उसी आधार पर होगा, उसी के अनुरूप कार्रवाई होगी। अपराधियों की तलाश तेज होगी। खुलासे पर नीचे से ऊपर तक दबाव रहेगा। भारत सरकार के मानक के मुताबिक, एक लाख की आबादी पर 145 पुलिसकर्मी होने चाहिए। इस हिसाब से उत्तर प्रदेश में 1.11 लाख पुलिसकर्मी कम हैं। सच सामने आएगा, तो संख्या बढ़ाने का सरकारों पर दबाव बनेगा। पर अभी जो हो रहा है, आखिर कब तक चलेगा? जब आबादी बढ़ रही है, पढ़े-लिखे बेरोजगार बढ़ रहे हैं, संसाधन बढ़ रहे हैं, खुलापन बढ़ रहा है, तो भला अपराध कम होने की कल्पना हम कैसे कर सकते हैं?

 

 
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