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शादियों की बाढ़ में डूब चले हम
गोपाल चतुर्वेदी
First Published:16-12-12 10:53 PM
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शहर में शादियों की बाढ़ है। होटलों से लेकर खुले मैदान, मोहल्लों के सामुदायिक केंद्र, पार्क, सड़क, हर जगह तंबू-कनात हैं। खुशियों के आतंकी बम-पटाखे हैं। गली-गली में बारात है, चौराहे-चौराहे भांगड़ा। मरियल घोड़ी पर धुत दूल्हा, अब गिरा कि तब। उसके साथ गिरती-लड़खड़ाती पियक्कड़ फौज है बारातियों की। नया जीवन शुरू करने के कैसे अनूठे अंदाज हैं? नवजात रोकर करता है, यह बदजात आपा खोकर। हर विवाह में बैंड-बाजे की समानता है। बैंड बेटी वाले का बज रहा है, आवाज बारात के साथ है। इन सुरा पीड़ितों का क्या भरोसा? अपनी एकदिवसीय सल्तनत के दंभ में वे किसी और के सजे मंडप में ही न घुस लें।

कौन कहेगा कि झुग्गी-झोंपड़ी के निर्धन भी इसी शहर की शोभा हैं? अगर उनमें से कुछ हर दावत में शिरकत कर लें, तो उनका एकाध महीने चैन से गुजारा मुमकिन है। ऐसा अनधिकृत प्रवेश रोकने को हर विवाह-स्थल पर चौकस मुस्टंडे तैनात हैं। बेरोजगार खुश हैं। कुछ कैटरिंग सेवा में रोजगार पा गए हैं, कुछ रोशनी के हंडे ढोने में। पंडित, वीडियो बनाने वाले व कैटरर के ठाठ हैं। आजकल रोज दो-तीन शिफ्ट कर रहे हैं। श्वान प्रसन्न हैं। जूठी प्लेटों की सफाई में जुटे हैं।

निमंत्रण पत्र देखकर हमारी तो कंपकंपी छूटती है। शगुन में कम राशि देना अपनी निम्न-मध्यवर्गीय मानसिकता को उसूलन मंजूर नहीं। आमंत्रण ठुकराना सामाजिक दायित्व से पलायन है। हम दो और हमारे दो का स्कूटर पर जाना विवशता है। कहने को तो होगा कि अपनी ‘गाड़ी’ पर आए हैं। पत्नी को साड़ी-गहने प्रदर्शित करने हैं, वरना परिचित हंसेंगे। शहर में दर्जनों लूटपाट के हादसे शादियों की तरह रोज होते हैं। एक गा-बजाकर लुटते हैं, दूसरे खौफ खाकर।

सरकार घाटे में नोट छापकर काम चलाती है, अपन उधार लेकर। उसके पास टैक्स बढ़ाने का विकल्प है, हमें तो शरमा-छिपाकर लिफाफे देने ही देने हैं। हम उस समझदार से सहमत हैं, जो कहता है कि इस मुल्क के नब्बे प्रतिशत निवासी मूर्ख हैं। दस फीसद अक्लमंद हैं, जो लिफाफा देने जैसी दकियानूसी परिपाटी में नहीं, सिर्फ लेने में यकीन रखते हैं। इन्हें नेता भी कहा जाता है।

 
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