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पांडेजी वेरी बिजी
सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार
First Published:15-12-12 10:10 PM
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‘हलो- मैं टनकपुर से रंजीत बोल रहा हूं। पांडेजी से बात हो सकती है?’
‘वह तो लखनऊ में ‘साहित्य-क्रीड़ा’ करने गए हैं।’
‘तो क्या कल बात हो सकती है?’
‘लेकिन कल तो कानपुर में सहज  पत्रिका का लोकार्पण करने वाले हैं।’
‘अच्छा परसों हो सकती है?’
‘परसों तो उन्हें झुमरी तलैया में ‘साहित्य की रक्षा’ गोष्ठी में जाना है।’
‘अच्छा यह बताइए, पांडेजी दिल्ली कब तक लौटेंगे?’
‘साहित्य का सीजन है। सब लोग इधर-उधर साहित्य करते फिर रहे हैं। ऐसे में पांडेजी घर में कैसे बैठे रह सकते हैं? उन्हें जगह-जगह साहित्य की देखभाल करनी होती है।’
‘आखिर कोई दिन तो होगा, जब वह दिल्ली में होंगे?’
‘बोला न! ही इज वेरी बिजी’
‘अगले महीने तो मिल जाएंगे?’
‘पांडेजी बारहों महीने बिजी रहते हैं। साहित्य का सीजन बारहों महीने रहता है। अगले महीने ‘महिला साहित्य में पुरुष क्यों घुसे जा रहे हैं’ विषय पर तीन दिन का वर्कशॉप है, उसमें रहेंगे। फिर देहरादून में पहाड़ और साहित्य पर केंद्रित पांच दिन का ‘पर्वत प्रसंग’ है। उसके बाद सूरत में ‘तिल, तिलक और तलवार’ पर सेमिनार है। फिर पटने में ‘कविता में कुछ-कुछ होता रहता है’ जैसे नए विषय का बीज-वपन करना है। फिर वह तीन दिन जालंधर रहेंगे और पांच दिन पटियाले में रहेंगे। उसके आगे उन्हें अंडमानी साहित्य रत्न देने जाना है।’
‘मैडम, अब आप ही उद्धार कर सकती हैं। हमारे बाबूजी कहते हैं कि जब तक पांडेजी नहीं आएंगे, तब तक टनकपुर में साहित्य नहीं होगा। दो दिन की तो बात है।’
‘अच्छा आप पांडेजी का मोबाइल नंबर नोट कर लें-सीधी बात कर लें।’
‘थाना में करते हैं ड्यूटी, बजाएं हाय पांडे जी सीटी! आदत पड़ी है नासपीटी, बजाएं हाय पांडे जी सीटी..।’ दबंग-टू  के इस सुपरहिट गाने की टोन सुनाई पड़ती है: ‘पांडेजी बोल रहे हैं?’
‘बोल रहा हूं।’
‘मैं टनकपुर से रंजीत कपिल बोल रहा हूं। एक साहित्य समारोह करना है। समारोह में चुंगी के चेयरमैन, कलक्टर, नगर सेठ मटरूमल और मुन्ना भैया भी रहेंगे। ये सब आपका लिखा पढ़कर आपके विचारों की ओर मुड़े हैं। आपको पढ़कर मैं बड़ा हुआ हूं। आपकी तीन पुस्तकें न केवल पढ़ी हैं, बल्कि शहर में सबको पढ़ाई हैं। प्रेस-टीवी  वाले रहेंगे, आप ‘इनोवा’ से आएं, किराए के अलावा पांच हजार नकद देंगे, बाकी दो गरम शॉल होंगी। एक इंपोर्टेड सूट लेंग्थ भी बजट में है। तिलक में चांदी का एक सिक्का भी मिलेगा। आप हां करें। सबसे महंगे होटल में ठहराया जाएगा। बस एक रात की बात है।’
‘अगर इन दिनों मैं आपके टनकपुर आया, तो मुझे तो 15 हजार का चूना लग जाएगा। उसे कौन भरेगा?’
‘सर आप आइए तो सही। 20-25 हजार तक कर देंगे। इधर पैसे की कमी नहीं है।’
उसके बाद पांडेजी की अध्यक्षता में टनकपुर में तयशुदा दिन साहित्य हुआ। समारोह की खुशबू दूर-दूर तक फैली। टनकपुर कस्बा साहित्य में छा गया! देखा पांडेजी का पव्वा!

 

 
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