शनिवार, 04 जुलाई, 2015 | 05:13 | IST
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चल चमेली बाग के चंचल चुनाव में
उर्मिल कुमार थपलियाल First Published:14-12-12 08:02 PM

सर्दियों के इन दिनों में गरम है, तो बस गुजरात। महत्वाकांक्षाओं के अलाव जल रहे हैं। मोदी के दोनों हाथों में गुनगुने मोदक हैं। विपक्षी कंबल खींचने में लगे हैं। मतदाता हाथ में अंगार रखे हैं। बीस-इक्कीस तारीख तक अगर दुनिया खत्म नहीं हुई, तो सुना है धर्मध्वजा फहराने लगेगी। सबको पता है कि महात्मा गांधी निर्वाचन क्षेत्र से इस बार फिर नाथूराम गोड्से जीतेगा। गोधरा फिर गोवर्धन की तरह महिमामंडित होगा। विकास बांध तोड़कर नदी-नालों में बहने लगेगा। नाम की नकेल और पटेल, दोनों एक जैसे। जैसे सपा, वैसे बसपा, दोनों खफा। नुकसान किसी का, दोनों का नफा।

खैर ये सब तो अगले हफ्ते का खेल-तमाशा है। गुजरात में सभी दल भवई के विभिन्न वेश में हैं। मंगलाचरण में तो यह है कि सभी कांग्रेसी पत्री-पंचांग बांच रहे हैं और फिर हर जगह भाजपा के करोड़पति नाच रहे हैं। वालमार्ट की बगल में अग्रवाल मार्ट है। कानाफूसी से फैलाई गई एक अफवाह यह भी है कि पुलिस और पूरा का पूरा सीआईडी महकमा सांसत में है। सांसत में इसलिए कि घोषित होने वाले चुनाव परिणाम पहले ही चोरी हो गए हैं। कांग्रेस वाले क्रिसमस के कोरल गाने में व्यस्त हो गए हैं। अफवाहों के हाथ-पैर नहीं होते। मुंह तो होता है। खर अब मेरा और एक गुजराती महिला का संवाद सुनिए।

मैं- अम्मा वोट दे आई? वृद्धा- लालूराम। मैं- कोई दिक्कत तो नहीं हुई? वृद्धा- लालूराम। कहां रहती हैं आप? लालूराम। उम्र कितनी होगी आपकी? लालूराम। अम्मा, मैं क्या पूछ रहा हूं और आप क्या जवाब दे रही हैं। लालूराम। तुम पागल हो क्या? लालूराम। ये क्या लालूराम-लालूराम बके जा रही हो? लालूराम। मैं जोर से चीखा- ये लालूराम है कौन? वृद्धा चिंतित होते हुए बोली- अरे वोट दिलाने लाया था रिक्शे पर बिठा के। बड़ा अम्मा-अम्मा कर रहा था। अब घंटे भर से इंतजार कर रही हूं। सुसरा जाने कहां गायब हो गया।

मैं बोला- अम्मा, तुम जाओ, वह अब नहीं आएगा। वृद्धा बोली- कौन? मैं बोला-  लालूराम। वह खीझकर बोली, न आए.. कौन मैंने उसकी पार्टी को वोट दिया है। मैं चुप, तो चुनाव चुप।

 
 
 
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