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जैक फोस्टर, तुमने मुझे मरवा दिया
नीरज बधवार First Published:13-12-2012 09:57:33 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

जो लोग हिंदी लेखकों से शिकायत करते हैं कि वे उन्हीं घिसे-पिटे पांच-छह विषयों पर कलम चलाते हैं, ट्रैवल नहीं करते, दुनिया नहीं देखते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि किसी भी तरह की मोबिलिटी पैसा मांगती है और जिन लेखकों की सारी जिंदगी दूसरों से पैसा मांगकर गुजर रही हों, वे मोबाइल होना तो दूर, एक सस्ता मोबाइल रखना तक अफोर्ड नहीं कर सकते।

यह लेख चूंकि फ्रेंच से हिंदी में अनुवाद नहीं है, लिहाजा यह स्वीकारने में मुझे भी कोई शर्म नहीं कि हिंदी लेखक होने के नाते ये सीमाएं मेरी भी हैं। पर इस बीच मेरे हाथ अमेरिकी एड गुरु जैक फोस्टर की किताब हाउ टु गेट आइडियाज लगी, जिसमें उन्होंने बताया कि लेखक को रूटीन में फंसकर नहीं रहना चाहिए। लॉस एंजिलिस के लेखक का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे नौ साल की नौकरी के दौरान कुछ नया देखने के लिए वह अलग-अलग रास्तों से ऑफिस जाते थे।

मैं भी जोश में आ गया। पूछने पर किसी ने बताया कि कचरे वाले पहाड़ के बगल में जो मुर्गा मंडी है, उस रास्ते से चाहो, तो जा सकते हो। अगले दिन मैं उस सड़क पर था। कुछ ही चला था कि अचानक बड़े-बड़े गड्ढे आ गए। गाड़ी हिचकोले खाने लगी। कुछ गड्ढे तो इतने बड़े थे कि भ्रम हो रहा था कि यहां कोई उल्का पिंड तो नहीं गिरा। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता गाड़ी उछलकर ऐसे ही एक छिपे गड्ढे से जा टकराई। जोरदार आवाज हुई। गाड़ी गरम होकर बंद हो गई। मेकैनिक ने बताया कि गड्ढे में लगने से इसका रैडिएटर व सपोर्ट सिस्टम टूट गया है। इंश्योरेंस के बावजूद दस-बारह हजार खर्चा आएगा। यह सुनते ही गाड़ी के साथ मैं भी धुआं छोड़ने लगा। दस हजार रुपये! मतलब अखबार में छपे 18-20 लेख। छह महीने की कमाई व बीस नए आइडियाज! जबकि मैं तो वहां नए आइडिया की तलाश में गया था। हे भगवान! रेंज बढ़ाने के लिए रूट बदलने के चक्कर में मैं आखिर क्यों पड़ा। रचनात्मकता साहस मांगती है, पर एक आइडिया के लिए दस हजार का नुकसान उठाने का साहस हिंदी लेखक में नहीं है। मैं ही बहक गया था। फोस्टर, तुमने मुझे मरवा दिया!

 
 
 
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