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मित्रों के लिए
नीरज कुमार तिवारी First Published:13-12-2012 09:56:56 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

कौन है जिसे मित्रता प्यारी नहीं। लेकिन गिनने बैठें, तो आपको लगेगा कि आपके शुभचिंतक उतने नहीं, जितना आपका बुरा चाहने वाले हैं। आपके करीब रहने वाले लोगों, रिश्तेदारों में भी आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो आपकी तारीफ पर कुढ़ते हों, समृद्धि से चिढ़ते हों। क्या सचमुच ऐसा है? शायद बहुत कम। ज्यादातर मामलों में हम जिसे शत्रु मानते हैं, वह हमारी कल्पना का शत्रु होता है। मनोवैज्ञानिक चाल्र्स स्पीलबर्गर कहते हैं, जैसे-जैसे माहौल प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है, काल्पनिक शत्रुओं की फौज तैयार होती जा रही है। हम खुद को भय और असुरक्षा से घिरा पाते हैं। ऐसे में, स्वाभाविक तौर पर हमें आस-पास के लोग षड्यंत्रकारी नजर आते हैं। दूसरे भी इसी माहौल में जी रहे हैं, इसलिए उनके लिए भी आप षड्यंत्रकारी ही हैं। बस बन गया तनाव का माहौल। ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि हम पहले खुद को भय और असुरक्षा की भावना से खाली करें। ऐसे लोगों से बचें, जिन्होंने नुक्स निकालने को अपना पेशा बना लिया है। नॉर्मन विन्सेंट पील लिखते हैं, ‘हर चीज गलत हो रही थी, हर चीज गलत थी और इसका एकमात्र कारण था कि मैं गलत था। मैं गलत सोच रहा था।’ यह चीज भी जरूरी है कि हम आलोचकों के आलोचक न बनें। अब्राहम लिंकन की बातों पर गौर करें। उन्होंने कहा कि एक दौर था, जब मुझे लगता कि आलोचक मुझ पर बेवजह की टीका-टिप्पणी करते हैं, मैं उन पर आगबबूला हो उठता था, लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि वे आलोचक नहीं हैं, वे मेरे मित्र हैं। उनकी बातों पर मैंने विचारना शुरू किया, तो पाया कि उनकी कुछ बातें बिलकुल सही हैं। मुझ उन पर विचार करना चाहिए। हम भी ऐसा कर सकते हैं, हमारे खिलाफ जो भी बातें आएं, उन्हें पॉजिटिव तौर पर लें। वे सच हों या झूठ, पॉजिटिविटी ही फैलाएं। धीरे-धीरे हम पाएंगे कि मित्रों की संख्या बढ़ रही है।

 
 
 
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