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हर सम्मान से बड़ा एक नाम
शुजात हुसैन खान, प्रसिद्ध सितार वादक First Published:12-12-12 10:15 PM

कल सुबह अमेरिका से फोन आया कि रवि काका नहीं रहे। मन को बड़ा धक्का लगा कि सितार के महान कलाकार पंडित रवि शंकर हमें छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह गए। टेलीविजन ऑन किया, तो तमाम टीवी चैनलों पर अलग-अलग तरीके से खबरें आ रही थीं। टीवी चैनल के लिए तो यह बस एक खबर थी, लेकिन मेरे लिए यह व्यक्तिगत नुकसान था। हिन्दुस्तानी संगीत के एक प्रमुख वाद्य यंत्र सितार को दुनिया भर में पहचान दिलाने और भारतीय संगीत को पूरी दुनिया, खासकर पश्चिमी देशों में लोकप्रिय बनाने में उनकी जो भूमिका थी और उनका जो योगदान रहा, वह तो हम सभी जानते और मानते ही हैं। इस नाते यह संगीत जगत और भारत का एक बहुत बड़ा नुकसान है। जबकि निजी तौर पर मेरे लिए यह इससे कहीं ज्यादा सदमे की बात है। दरअसल, वह मेरे रवि काका थे, जो कोलकाता में तब से मुझे प्यार करते आ रहे थे, जब मैं सिर्फ ढाई साल का था। उन्होंने मुझे सितार का ज्ञान नहीं दिया। सितार बजाना तो मैंने अपने अब्बा जान (उस्ताद विलायत खान) से ही सीखा, जिन्हें काफी लोग पंडितजी के प्रतिद्वंद्वी भी मानते थे। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनियादारी मैंने पंडितजी से ही सीखी। उनके पास पूरी दुनिया का, पूरी दुनिया में अपनी कला के प्रदर्शन का बहुत ज्यादा तजुर्बा था। इस तजुर्बे का फायदा मुझे भी मिला। रवि काका अक्सर मेरा मार्गदर्शन करते रहते थे कि विदेशी संगीत प्रेमियों को अपने संगीत के रंग में कैसे रंगा जा सकता है और उनके मन पर अपने सितार के जादुई संगीत की छाप कैसे छोड़ी जा सकती है। मुझे अभी तक विदेशों में जो ढेर सारा प्यार और पहचान मिली है, उनके लिए मैं रवि काका के मार्गदर्शन को बेहद महत्वपूर्ण मानता हूं।

सितार को सात समंदर पार लोकप्रियता दिलाने के उनके प्रयास के दौरान कुछ लोगों ने उन पर आरोप भी लगाए। कुछ लोग तो उनसे इसलिए भी नाराज रहे, क्योंकि उन्होंने विदेशों में तो बहुत काम किया, लेकिन अपने देश में वह जरा भी ध्यान नहीं दे पाए। वैसे यह भी सच है कि इस तरह की बातें सभी बड़े संगीतकारों के बारे में होती ही रहती हैं। हालांकि, रवि काका ने इन बातों को कभी दिल से लगाया नहीं। मुझे लगता है कि ये ऐसी बातें भी नहीं हैं। इस तरह की आलोचनाओं में उन लोगों का प्यार झलकता है, जो अपने बीच उनकी कमी महसूस करने के कारण ऐसा कहते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो भारतीय जन-मानस पर उनकी इतनी गहरी छाप नहीं दिखती। देश के बाहर संगीत में उनके योगदान के लिए उन्हें एक-दो नहीं, बल्कि तीन-तीन बार ग्रैमी अवॉर्ड मिला, तो भारत में भी उन्हें तमाम अवॉर्ड मिले। इस देश ने उन्हें ‘भारत रत्न’ का सम्मान दिया, जिससे बड़ा कोई अवॉर्ड इस देश में है ही नहीं। यह भी हो सकता है कि भारत में रहते तो शायद रवि काका इतना बड़ा काम कर भी नहीं पाते। इसके अलावा, एक और कारण से बाहर रहना उनकी मजबूरी थी। दरअसल, उनका परिवार भी बाहर ही था। लेकिन अच्छी बात यह है कि भारत से उन्होंने अपना संबंध हमेशा बनाए रखा। वह भारत और इसकी संगीत परंपरा से हमेशा जुड़े रहे। यहां संगीत की शिक्षा देने के लिए अनेक केंद्र खोलकर भी वह अपनी जिम्मेदारी को कई तरह से निभाते रहे।

मुझे लगता है कि उनके योगदान के बारे में मेरा कुछ भी कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि मैं इसके लिए खुद को योग्य नहीं मानता। हमारा उनका पारिवारिक संबंध तब से रहा, जब हम कोलकाता में रहते थे। थोड़ा बड़ा हुआ, तो मैंने कई बार अपने अब्बा जान और रवि काका को एक साथ मंच पर सितार बजाते हुए देखा-सुना। बाद में उनके पूरे  जीवन का जानने-समझने की कोशिश भी की। बनारस में उनका जन्म हुआ था, कोलकाता में काफी समय बिताया, अपने भाई उदय शंकर के डांस ट्रप में यूरोप और अमेरिकी देशों की यात्रा, आकाशवाणी में संगीत-निर्देशन, लोकप्रिय वाद्य वृंद्य का निर्माण, एक-दो नहीं, कई अद्भुत रागों का निर्माण, सरहद पार जाकर सितार का जादू चला लेना.. तब उनके ये सारे काम हमें बहुत अनोखे लगते थे। हम लोग इस बात पर गर्व करते थे कि हमारे अपने देश व अपने शहर का एक विलक्षण संगीतकार दुनिया के मंच पर अपने सितार के जादू की छाप छोड़ रहा है। उस सयम ही उनकी कामयाबी की ये कहानियां मुझे हर्षित और रोमांचित करती थीं, लेकिन उससे भी अधिक रोमांचित मुझे वे पल करते थे, जो उनके साथ उनके कमरे में मैंने बिताए थे। वह मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करते थे और दुनियादारी की बातें सिखाते थे। उस समय मुझे वह न केवल एक बहुत ही उम्दा कलाकार मालूम होते थे, बल्कि निहायत ही अच्छे इंसान भी नजर आते थे।

वक्त के साथ उनका व्यक्तित्व और कद इस कदर विशाल हो गया कि पुरस्कार और मान-सम्मान का महत्व उनके लिए गौण होता चला गया। कई बार लगता है कि जैसे ये सम्मान उनके बहाने खुद सम्मानित होने का तरीका ढूंढ़ रहे हों। अपने देश में भी संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, राज्य सभा की सदस्यता, पद्म अवॉर्ड और सबसे बड़ा सम्मान ‘भारत रत्न’ उन्हें मिला। पंडित रवि शंकर हमेशा जोश से भरे, जिंदादिल और जवान बने रहे। अपनी उम्र को उन्होंने काम के रास्ते कभी आने नहीं दिया। हमेशा और बेहतर करते रहने की बेचैनी उनमें दिखती थी। इसी का नतीजा है कि उनके नए एलबम द लिविंग सेशंस पार्ट-1 के लिए उनका नाम वर्ष 2013 के ग्रैमी अवॉर्ड के लिए नामित है। कभी-कभी उनसे बातचीत करते हुए लगता था कि वह अभी और बहुत कुछ करना चाहते थे। वैसे, हमारी बदकिस्मती है कि जो अधूरा छूट गया, वह अब कभी पूरा नहीं हो सकेगा। वक्त ने उन्हें हमसे बहुत जल्दी छीन लिया। वह एक उम्दा और भरपूर जीवन जी पाए, बस यही एक संतोष की बात है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
 
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