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क्रूर मजाक के मनोरंजन से उठते सवाल
एंड्रयू ब्राउन, ब्रिटिश पत्रकार First Published:12-12-2012 10:15:12 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

भारतीय मूल की नर्स जेसिंथा सलदान्हा ने आत्महत्या क्यों की, इसे लेकर विवाद हो सकता है। लेकिन उससे क्रूर मजाक करने वाले रेडियो जॉकी को अब उसी हिस्टीरिया का शिकार होना पड़ रहा है, जिसका वह खुद कारोबार करते थे। उनकी सार्वजनिक निंदा से अब वे श्रोता संतुष्ट होंगे, जो उनके द्वारा लोगों का मजाक उड़ाने से खुश होते थे। दोनों में एक ही चीज समान है कि कुछ लोग दूसरों को परेशानी में पड़ते देखकर खुश होते हैं। परेशान करना मुख्य काम है, अगर शाही परिवार को परेशान नहीं कर सकते, तो नर्स को ही करते हैं। हालांकि, यह सिर्फ लक्षण है, यह समस्या नहीं है। असली समस्या है हमारे मीडिया के काम करने का तरीका।

मीडिया में बहुत से लोग उन रेडियो जॉकी से हमदर्दी रखते हैं, क्योंकि उन्हें यह अंदाज नहीं था कि बात इस हद तक पहुंच जाएगी। हम सभी को कभी न कभी ऐसे पेशेवर जोखिम उठाने पड़ते हैं, जिनके नतीजे में तबाही ही पल्ले पड़ती है। कई काम ऐसे होते हैं, जिनके लिए हम अपने अलावा किसी और को दोष नहीं दे सकते। लेकिन यह मसला ऐसा नहीं है। कुछ जोखिम ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में नहीं उठाना चाहिए। एक अन्य प्रतिक्रिया यह है कि इस मामले में एक आम नागरिक को शिकार बनाया गया, इसलिए यह गलत है। हालांकि, मीडिया में इस तरह की आचरण संहिता का पालन नहीं किया जाता कि अगर आप सार्वजनिक जीवन में हैं, तभी आपके साथ यह व्यवहार किया जाएगा, वरना नहीं। वैसे यह आसान भी नहीं है कि हम सार्वजनिक जीवन वाले व आम नागरिक को हर समय अलग-अलग करके देख सकें। काफी समय पहले एक आदमी ने एक महिला पुजारी को अदालत में खींचा, तो मैंने उस शख्स का मजाक उड़ाने वाला एक लेख अपने अखबार में छाप दिया था। हजारों लोगों ने इसे पढ़ा होगा और हंसकर भुला दिया होगा। लेकिन मेरे पास एक फोन आया, फोन करने वाले ने कहा कि आपने गलत किया, उस शख्स के बारे में ऐसी बात पढ़कर मेरी मां की आंखों में आंसू आ गए। ऐसे मौके पर यह सोचना तो बिलकुल गलत होता कि मैं बहुत चालाक हूं और तुम मूर्ख। आखिर उसकी कोई गलती नहीं थी।

यह धर्मसंकट कई पत्रकारों के सामने आता है। कई बार मैं कुछ यह सोचकर लिखता हूं कि लोग इसे पढ़ेंगे और हंसेंगे। अक्सर हंसाने की कोशिश में किसी का मजाक भी उड़ाया जाता है। यह ठीक है कि हम अब उतने क्रूर नहीं हैं, जितने हमारे वे पूर्वज थे, जो शिकार करने जाते थे व लोगों को सार्वजनिक फांसी दिए जाने के दर्शक बनते थे। पर हम उनसे ज्यादा डरे हुए और उनसे ज्यादा असुरक्षित हैं। हम जिनसे डरते हैं, वही व्यवहार दूसरों से करते हैं। दिक्कत सिर्फ यह है कि कुछ दिनों में हम जेसिंथा सलदान्हा को भी भूल जाएंगे व उस रेडियो जॉकी को भी, लेकिन मजाक उड़ाने वाले यह शो चलते रहेगे।
गार्जियन से साभार
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
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