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उनकी कुल्हाड़ी ही है जगन्नाथ
राजेन्द्र धोड़पकर First Published:12-12-12 10:13 PM

भाजपा और वाम दलों ने आखिरकार अपना एक पंचवार्षिक आयोजन पूरा कर लिया। आयोजन यह है कि जब लोकसभा चुनाव करीब हों और कांग्रेसी निकम्मेपन, भ्रष्टाचार वगैरह आरोपों से घिरे हुए चुनाव हारने को तैयार हों और यह लगे कि विपक्षी बिना किसी कोशिश के जीत सकते हैं, तब ये दोनों शक्तियां बड़ी मेहनत से एक कुल्हाड़ी ढूंढ़कर लाती हैं और मिलकर उस पर धार चढ़ाती हैं।  परस्पर सहयोग से ये दोनों शक्तियां अपना-अपना पैर कुल्हाड़ी पर दे मारती हैं, वामपंथी भाजपा के दाहिनी ओर खड़े होते हैं, ताकि वे वामपंथी होने के नाते बायां पैर मार सकें और भाजपाई वामपंथियों के वाम में खड़े होते हैं, ताकि वे दाहिना पैर मार सकें। कांग्रेसी इसे देख अपने-अपने कामों में लग जाते हैं, जो ठीक-ठीक क्या हैं, किसी को नहीं पता।

पिछले चुनाव के पहले परमाणु समझौता नामक कुल्हाड़ी थी, इस बार खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश नामक कुल्हाड़ी है। अब दोनों राष्ट्रहित के नाम पर अपने-अपने पैरों पर भारी मरहम-पट्टी किए बैठे हैं और अगर अब भी सत्तारूढ़ गठबंधन चुनाव हारता है, तो यह उसकी प्रतिभा ही कही जानी चाहिए। भाजपाइयों की दिक्कत यह है कि वह हर उस चीज को राष्ट्रविरोधी मानते हैं, जिसे कांग्रेसी करते हैं। मसलन, भ्रष्टाचार, निकम्मापन वगैरह और वे हर उस चीज को राष्ट्रवादी मानते हैं, जो वे खुद करते हैं, मसलन भ्रष्टाचार, निकम्मापन वगैरह। वामपंथी तो भाजपाइयों से भी ज्यादा उग्र राष्ट्रवादी हो गए हैं। जब सोवियत साम्राज्य था और चीन में माओ का राज था, तब वे विचारों से लेकर आचार तक, सब विदेश से आयात करते थे। पर अब वामपंथियों के पास भारत के अलावा कोई देश ही नहीं बचा, सो मजबूरी में वह उग्र राष्ट्रवादी हो गए, हर विदेशी चीज का विरोध करने लगे। अब वामपंथी अपना बायां हाथ भाजपाइयों के दाहिने हाथ में थमाकर कुल्हाड़ी की तलाश में निकलते हैं, क्योंकि उससे ज्यादा आधुनिक कोई भी औजार या हथियार राष्ट्रवाद की भावना के खिलाफ है। वे ये करते हैं तो करें, पर लोकतंत्र में कांग्रेस का ऐसा विकल्प भी तो होना चाहिए, जिसकी दोनों टांगें साबुत और मजबूत हों।

 
 
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