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क्या कानून खत्म कर पाएगा महिला उत्पीड़न
ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री First Published:11-12-12 07:08 PM

भारत में 17 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार बनती हैं। यह आंकड़ा संगठित व असंगठित क्षेत्रों में कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न की बढ़ती हुई घटनाओं को दर्शाता है। ऑक्सफैम इंडिया की ओर से कराए एक जनमत सर्वेक्षण में यह बात उभरकर सामने आई है। यह सर्वेक्षण ऑक्सफैम इंडिया व आईएमआरपबी इंटरनेशनल की इकाई सोशल ऐंड रूरल रिसर्च इंस्टीटय़ूट की ओर से संयुक्त रूप से किया। इस सर्वेक्षण में जिन 400 महिलाओं से बात की गई, उनमें से 66 ने बताया कि उन्हें यौन उत्पीड़न की 121 घटनाओं का सामना करना पड़ा। जिनमें से 102 घटनाएं शारीरिक उत्पीड़न से जुड़ी नहीं थीं, जबकि शेष 19 शारीरिक उत्पीड़न की थीं। इसी तरह अहमदाबाद वुमेन्स एक्शन ग्रुप द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि लगभग 48 प्रतिशत महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर मौखिक, मानसिक व शारीरिक यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है।

ऐसे सर्वेक्षण बहुत कुछ बताते हैं तो बहुत कुछ नहीं भी बता पाते। एक तो सामाजिक सम्मान के नाम पर उत्पीड़न की बहुत सी बाते छुपा ली जाती हैं, दूसरे नौकरी से हाथ धोने का खतरा होने के कारण इनका जिक्र नहीं किया जाता। इसके अलावा जहां तक अशिक्षित और खासकर मजदूरी करने वाली महिलाओं का मामला है, वहां स्थिति और भी गड़बड़ है। वहां इन महिलाओं को यह भी नहीं पता होता कि उनके अधिकार क्या हैं। वे इस तरह के उत्पीड़न को अपनी नियति मान लेती हैं। यही स्थिति बाल महिला मजदूरों की भी है। अक्सर कईं मासूम बच्चियों को तो पता भी नहीं होता कि उत्पीड़न क्या चीज है। फिर आमतौर पर ऐसी महिला श्रमिक असंगठित क्षेत्र में ज्यादा होती हैं। ऐसे क्षेत्र में जहां रोजगार और मेहनताना कुछ भी नियमित नहीं होता। उनकी प्राथमिकताएं आर्थिक ज्यादा होती हैं, जिनके सामने उत्पीड़न को अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है।

उत्पीड़न से निपटने की जरूरतों को देखते हुए सरकार ने ‘महिलाओं का कार्यस्थलों पर लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण विधेयक’ तैयार किया है। इसके प्रावधानों के अनुसार कार्यस्थलों पर उत्पीड़न के सभी मामलों में जवाबदेही नियोक्ता के साथ ही जिला मजिस्ट्रेट अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट या कलैक्टर की होगी और साथ ही इस प्रकार की शिकायतों के निपटारे के लिए एक शिकायत निवारण तंत्र भी विकसित करना होगा। ये विधेयक कब कानून का रूप ले सकेगा अभी नहीं कहा जा सकता। यह मुद्दा चर्चा में जरूर है लेकिन सरकार, विपक्ष और प्रशासन शायद किसी की भी प्राथमिकता सूची में नहीं है। इसके प्रावधान उम्मीद भले ही बंधाते हों, पर संगठित श्रम कार्यस्थलों पर इसे लागू करना संभव है, किंतु असंगठित महिला श्रमिकों, विशेषकर घरेलू महिला श्रमिकों के लिए संभव नहीं दिखता। अभी तो इसके प्रति जागरूकता पैदा करना ही सबसे बड़ी जरूरत है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 
 
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