गुरुवार, 27 नवम्बर, 2014 | 02:55 | IST
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जीवन संग्राम में चरण स्पर्श का ब्रह्मास्त्र
सुरेश नीरव First Published:10-12-12 07:34 PM

पांव छूना भारतीय, खासकर हिंदू संस्कृति का प्राण तत्व है। पांव छूना और छुलवाना हमारी प्राचीन सनातन सांस्कृतिक गतिविधि है। पद-प्रमोशन, पुरस्कार, प्रतिष्ठा, नाना प्रकार की उपलब्धियां हमें पांव छूने से ही प्राप्त होती हैं। सैकड़ों नमस्कार पर एक चरण स्पर्श हजार गुना भारी पड़ता है। आज के जीवन-संग्राम में जो चरण स्पर्श के हथियार से लैस नहीं है, उसके पांव क्या उखड़ेंगे? वे तो कभी जम ही नहीं पाते। कामयाबी के इतिहास में वही बड़ा है, जो अपने पैरों पर खड़ा है। और अपने पांवों पर खड़े होने की ताकत भी वही पाता है, जो खुशी-खुशी अपने आका की लातें खाता है। ऐसे दुर्दात चरण सिंह-कदम सिंह ही तो डिनर में सौभाग्य से मुर्गे की लातें (चिकन लेग्स) खाते हैं।

कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते, मगर अक्ल बहुत तेज होती है। कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, मगर आंखों पर पट्टी बंधी रहती है। इसी गड़बड़ का फायदा उठाकर झूठ कानून की गोद में बैठकर हाईकमान-जैसी हरकतें करने लगता है।  शर्मीले लोग खड़े-खड़े अपनी टांगें भींचते हैं। बहादुर लोग उन्हें खींचते हैं, जबकि कुछ चापलूसी के जल से चरण-कमल सींचते हैं। भले ही वह पांव हाथी पांव ही क्यों न हो!

सत्ता के चरण हमेशा कमल होते हैं। नेता के आचरण कितने भी गड़बड़ क्यों न हों, उसके चरण कभी कटहल नहीं होते। भारत का हर नेता जनता से अपने हाथ मजबूत करने की फरियाद करता है। अपने समर्थन में टांग नहीं, हमेशा हाथ ही उठवाता है। पांव छूने का महत्व दो पांव वाले ही जानते हैं, इसीलिए तो ये चौपायों पर भारी पड़ते हैं। चरण वंदना, पांव पखारना, पांय लागूं, पालागन, कदमबोसी व पैरी पेना, इसी चरण-छू क्रिया के सर्वनाम हैं। और इस मनुष्य की सारी कामयाबी का इतिहास पांव बढ़ाने, अड़ाने और पांव उठाने का ही सनातन व्यसन है, जो उसके डीएनए में काफी गहराई तक अपने पांव जमा चुका है। भगवान करे आप भी जल्दी से किसी चरण-छू सिंडीकेट के सदस्य बन जाएं। आप सरकार की तरह अपने कदम बढ़ाएं। विरोधी न कभी आपकी टांग खींचें, और न आपके मामले में टांग अड़ाएं।

 
 
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