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अजन्मे को जान लें
अमृत साधना First Published:10-12-12 07:33 PM

ग्यारह दिसंबर ओशो का जन्मदिन है। वैसे ओशो का कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ओशो तो उस चेतना का नाम है, जो रजनीश नाम की देह में रहती थी। बहरहाल, सुविधा के लिए हम ओशो ही कहें। तो ओशो ने हर अवसर का उपयोग लोगों को जगाने के लिए किया। एक बार उनके जन्मदिन पर लोग इकट्ठा हुए, तो ओशो ने जो कहा, वह उनकी शैली के माकूल था। ओशो ने पूछा, जन्मदिन को हम उत्सव क्यों बना लेते हैं? वह इसीलिए कि जीवन का तो हमें कोई पता नहीं। अगर जीवन का हमें पता हो, तो प्रतिपल हमारा उत्सव हो जाए। अगर जीवन का हमें पता हो जाए, तो मैं समझता हूं कि जन्म का उत्सव फिर हम न मनाएं, क्योंकि जन्म तो सिर्फ एक शुरुआत है।

प्रत्येक जन्मदिन जन्म की कम याद दिलाता है, आने वाली मौत का ज्यादा स्मरण कराता है। हर जन्मदिन का मतलब सिर्फ यह है कि एक वर्ष और आदमी मरा, जिंदगी से एक वर्ष और रिक्त हुआ। मगर इस तरह से कौन सोचता है? लोग मृत्यु को अशुभ मानते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हम शुभकामना नहीं दें, या फूल न भेजें किसी के जन्मदिन पर। फूल से सुंदर प्रतीक हो नहीं सकता। जन्मदिन पर फूल भेजना ही चाहिए, क्योंकि वह आपको जगाने का काम करता है। सुबह आया नहीं कि सांझ में उसे फेंक देना पड़ेगा।

सुबह वह जन्मदिन की खबर लेकर आया था, और सांझ में मृत्यु के दिन की खबर लेकर जा चुका है। जन्मदिन के अवसर पर ओशो का यह संदेश विचारणीय है: ‘फूल तो जरूर भेजते जाएं, अभिनंदन भी जरूर करें, शुभकामनाएं भी जरूर दें। लेकिन इससे किसी भ्रांति को जन्म न दें। मृत्यु को अलग काटकर मत रख देना। अच्छी दुनिया हो, तो मैं मानता हूं कि हमें मृत्यु-दिन ही मनाना चाहिए।’ वास्तविक जन्मदिन तभी होगा जब हम अपने भीतर के उस अजन्मे को जान लें, जो न कभी जनमता है, और न मरता है।

 
 
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