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इतिहास के मोड़ पर दो नायक
आशुतोष, मैनेजिंग एडीटर, आईबीएन 7 First Published:09-12-12 10:51 PM

सचिन तेंदुलकर और लालकृष्ण आडवाणी, दोनों ही उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां से आगे का रास्ता दिखता नहीं, लेकिन दोनों ही अपनी जिद में आगे का रास्ता खोजने को बेताब हैं। आडवाणी की उम्र 85 साल है। इस उम्र में किसी भी आदमी का शरीर उससे गुस्ताखी करने लगता है। सचिन भी 39 साल के हैं। इस उम्र में एक क्रिकेटर अमूमन संन्यास ले लेता है। कायदे से उन्हें अपने किसी जूनियर के लिए जगह छोड़ देनी चाहिए, पर सचिन भी आडवाणी की तरह आलोचकों को झुठलाने में लगे हैं।

आरएसएस ने साल 2004 के आम चुनाव में हार के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी को हट जाने का संदेश दे दिया था। वाजपेयी बीमारी की वजह से काफी पहले रिटायर हो चुके हैं, लेकिन आडवाणी अभी तक रिटायर होने को तैयार नहीं हैं। आज भी वह संसद में भाजपा संसदीय दल के चेयरमैन हैं। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, मुरली मनोहर जोशी, नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह के होते हुए वह अपने को प्रधानमंत्री पद का सबसे सशक्त दावेदार मानते हैं और यह महसूस करते हैं कि अगर मौका मिले, तो देश को अगले पांच साल तक नई दिशा दे सकते हैं। यह अलग बात है कि बीजेपी के अंदर के बिखराव के लिए काफी लोग आडवाणी की इस जिद को जिम्मेदार मानते हैं। मेरा तो यह साफ मानना है कि बीजेपी तब तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं होगी और निर्णायक भूमिका के लिए तैयार नहीं होगी, जब तक कि वह आडवाणी के साये से बाहर नहीं निकलती। ठीक उसी तरह, जैसे भारतीय क्रिकेट टीम में सचिन की मौजूदगी टीम को कमजोर करती है। सचिन की उपस्थिति टीम को मनौवैज्ञानिक रूप से अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित नहीं करती। उनके खेलने से टीम में एक नवोदित खिलाड़ी की जगह तो बाधित होती ही है और जब वह जल्दी आउट हो जाते हैं, तो टीम के अन्य बल्लेबाजों को लगता कि जब सचिन जैसा बल्लेबाज नहीं खेल पाया, तो उसकी क्या बिसात? फिर सचिन के रहते नई टीम की रचना नहीं की जा सकती।

दोनों ही अपने-अपने फन के माहिर हैं। मेरा इरादा उनकी शान में गुस्ताखी करने का कतई नहीं है। एक समय के बाद हर आदमी अपने अतीत की ही खाता है, लेकिन जब अतीत वर्तमान और भविष्य को निर्धारित करने लगे, तब परेशानी खड़ी हो जाती है। आडवाणी का जमाना था। एक जमाने में बीजेपी भारतीय राजनीति का एक हिस्सा तो थी, लेकिन उसकी उपस्थिति कोई फर्क नहीं डालती  थी। यहां तक कि वाजपेयी जैसे महामानव के बावजूद 1985 में उसे लोकसभा चुनाव में सिर्फ दो सीटें मिली थीं और लोगों को लगता था कि बीजेपी कुछ भी कर ले, वह कभी कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सकती। आडवाणी ने इस मिथ को तोड़ा। आडवाणी के अखिल भारतीय उदय के पहले बीजेपी को दकियानूसी लोगों का दल कहा जाता था, जो इतिहास से न तो सबक लेने को तैयार थे और न ही उसकी गोद से बाहर आने के लिए बेचैन। बीजेपी को तब मॉडर्न तो कहीं से भी नहीं कहा जाता था। आरएसएस ने आपातकाल के बाद से ही विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में अयोध्या का मुद्दा उठा रखा था। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसकी कोई धमक नहीं थी। आडवाणी की रथयात्रा ने सब कुछ बदल दिया। राममंदिर का मसला अचानक पूरे देश में एक मुद्दा बन गया। पूरे देश का विमर्श बदल गया।

आडवाणी ने कांग्रेस के सेकुलरिज्म को खुली चुनौती दी। भारतीयता, देश व राजनीति को देखने का, विवादास्पद ही सही, एक नया नजरिया दिया। इसके पहले देश के विमर्श में वामपंथी सोच हावी थी। वैकल्पिक सोच व विमर्श के लिए कोई स्थान नहीं था। खुद कांग्रेस इसी वामपंथी सोच से पीड़ित थी। यह महज इत्तफाक नहीं हो सकता कि अयोध्या मुद्दे के समय देश ने समाजवादी अर्थव्यवस्था की जगह बाजारवाद को अपनाने का फैसला किया। कांग्रेसवाद टूटा, तो वामपंथ की लुगदी में पल रही समाजवादी सोच का माया संसार भी टूट गया और देश ने पूंजीवादी बाजारवाद को अपना लिया। यह आडवाणी का करिश्मा था कि आरएसएस के जिस हिंदुत्व को बौद्धिक वर्ग दकियानूसी और विचार के लायक नहीं मानता था, उसके समर्थन में एक नया बुद्धिजीवी वर्ग खड़ा हो गया। गिरिलाल जैन, स्वपन दासगुप्ता, सुधींद्र कुलकर्णी और चंदन मित्र जैसे प्रखर वामपंथी हिंदुत्व की अलख जगाने लगे। आडवाणी ने देश में हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को एक बड़े तबके में स्वीकार्य बना दिया। कांग्रेस के एकाधिकारवाद को आम और खास, दोनों तबकों में छिन्न-भिन्न कर दिया। बीजेपी केंद्र की सत्ता में कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प बन गई।

आडवाणी की तरह सचिन ने जब भारत के लिए खेलना शुरू किया था, तो उसके पहले तक भारतीय  टीम सुनील गावस्कर, विश्वनाथ, बेदी, कपिल देव जैसे खिलाड़ियों के बावजूद जीतने के लिए कम और हारने के लिए या फिर हार से बचने के लिए खेलती थी। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारतीय बल्लेबाजों और गेंदबाजों की सराहना तो होती थी, मगर विपक्षी उनसे खौफ नहीं खाते थे। सचिन ने 16 साल की उम्र में जब गेंदबाजों की धुर्रियां बिगाड़नी शुरू की, क्रिकेट का संतुलन भी बिगड़ने लगा। बल्लेबाजी के सारे रिकॉर्ड सचिन ने ध्वस्त कर दिए। वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सौ सेंचुरी बनाने वाले अकेले बल्लेबाज बन गए और उन्हें क्रिकेट का भगवान कहा जाने लगा। सचिन के साथ राहुल द्रविड़, लक्ष्मण और सौरव की मौजूदगी ने क्रिकेट के गुरुत्व केंद्र को भारत की तरफ मोड़ दिया। अब भारत जीतने के लिए खेलने लगा। भारत को हराना अब आसान नहीं रह गया। पहले जो भारतीय हार पर भी टीम से सहानुभूति रखता था, उसका मिजाज बदल गया और अब उसको टीम की हार पचती नहीं है। टीम नंबर वन टीम बन गई। 2007 में उसने ट्वंटी-20 का वर्ल्ड कप जीता। 2011 में उसने वन-डे का वर्ल्ड कप अपने कब्जे में किया। सचिन ने आडवाणी के हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बरक्स क्रिकेट-राष्ट्रवाद को स्थापित किया। सचिन ने क्रिकेट में वही किया, जो आडवाणी ने राजनीति में किया। दोनों ने पुरानी स्थापनाओं को ध्वस्त किया, नई स्थापना की संरचना की। देश के विमर्श को इतिहास की अंधी गली से निकालकर उसे नई रोशनी दी। लेकिन हर नई रोशनी, हर नई स्थापना समय के साथ पुरानी पड़ने लगती है और फिर देश-काल नए नायक की तलाश करता है। यही इतिहास की खूबसूरती भी है और विडंबना भी। ऐसे में सचिन और आडवाणी भी पुराने पड़ चुके हैं। इतिहास के इस कटु सत्य के सामने झुकने के अलावा उनके सामने और कोई रास्ता नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
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