गुरुवार, 23 अक्टूबर, 2014 | 06:08 | IST
  RSS |    Site Image Loading Image Loading
कब सीखेंगे हमारे देश के अभिभावक
जयंती रंगनाथन, सीनियर फीचर एडीटर, हिन्दुस्तान First Published:09-12-12 10:51 PM

बचपन और स्कूली दिनों को याद करें, तो किस बात पर आज सबसे अधिक तंज होता है? बाल मनोचिकित्सक अनिल जॉर्ज की मानें, तो अपने अभिभावकों और शिक्षकों के हाथों प्रताड़ित होने का गम जिंदगी भर सालता है। हमारे देश में लालन-पालन के गूढ़ार्थ में छिपी है बच्चों की पिटाई। बिना डांटे-पीटे बच्चों को अनुशासित करने की कला भारतीय अभिभावकों को जरा कम ही आती है। नई पीढ़ी के कुछ माता-पिता जरूर बच्चों को डांटने-डपटने और मारने से बचते हैं। पर बाल कल्याण आयोग और स्वयंसेवी संस्थाओं की मानें, तो आज भी हमारे देश में दस साल की उम्र से कम के लगभग 72 प्रतिशत बच्चे बदमाशी, पढ़ाई और खाने से लेकर तमाम दूसरी बातों के लिए कड़ी सजा पाते हैं।

ऐसे में खबर आती है नॉर्वे से, डेढ़ साल के अंतराल में दोबारा भारतीय अभिभावक अपने बच्चों के साथ बदसलूकी की वजह से कठघरे में खड़े कर दिए गए। पहली दंपती कोलकता से थी, इस बार आंध्र प्रदेश से है। पिता चंद्रशेखर और मां अनुपमा इंजीनियर हैं। पहली दंपती का बेटा ऑटिस्टिक था। इस बार सात साल के बेटे साई श्रीराम ने स्कूल में अपने शिक्षकों से कह दिया कि उसके अभिभावक उसे डराते-धमकाते हैं। वह बिस्तर गीला करता है, तो उसे भारत वापस भेजने की धमकी देते हैं। साई श्रीराम की देह पर कुछ जले के निशानों ने माता-पिता को दो साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे ही पहुंचा दिया। माता-पिता का तर्क था कि बेटा कहानी बनाने में होशियार है। खेल-खेल में लगे चोट का वितंडा बनाया जा रहा है। हम यह अन्याय कैसे कर सकते हैं?

उनकी गुहार कोई सुनने को तैयार नहीं। भारतीय अभिभावक बेशक नौकरी के लिए बाल-बच्चों सहित विदेश पहुंच जाते हैं, पर उनका आचरण शत-प्रतिशत देसी ही रहता है। अमेरिकी लेखिका और शिक्षिका जूलिया वॉल ने कुछ समय पहले अपने ब्लॉग में हमारे देश के अभिभावकों के बारे में लिखा था- ‘मेरी कक्षा में कई भारतीय मूल के बच्चे पढ़ते हैं। मुझे उन्हें देखकर तरस आता है। मैंने पैरेंट-टीचर मीटिंग के दौरान इनमें से कई को अपने बच्चों से गुस्से में बात करते देखा है। कम नंबर आने पर वे अपने बच्चों की तौहीन करते हैं। वे हमारी तरह बच्चों का लालन-पालन क्यों नहीं करते? यह कमी मुझे चाइनीज माता-पिता में नजर नहीं आती।’

बच्चों की परवरिश को लेकर हम बहुत कम बदले हैं। वैसे शिक्षक भी बच्चों के साथ अमानवीय बर्ताव करने में पीछे नहीं हैं। देश भर में बच्चों को सजा देने के नाम पर कभी उनके कपड़े उतरवाए जाते हैं, तो कभी मूत्र पीने को बाध्य किया जाता है। मारपीट तो आम बात है। नॉर्वे सहित दूसरे कई देश बच्चों को लेकर अति संवदेनशील हैं। वे बच्चों को राष्ट्रीय धरोहर मानते हैं और उनके साथ किसी किस्म की प्रताड़ना बर्दाश्त नहीं करते। वहां जाने वालों को इसके लिए अच्छी तरह खुद को तैयार करना होगा।

 
 
 
|
 
 
टिप्पणियाँ