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बूढ़े तो रखें हमउम्र का खयाल
गोपाल चतुर्वेदी
First Published:09-12-12 10:50 PM
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देश की राजनीति का यह ध्रुव सत्य है। हमारी सियासत वृद्धाश्रम का पर्याय है। विश्वास न आए, तो कोई केंद्रीय मंत्रिमंडल की औसत आयु देख ले। बड़े-बूढ़ों का इतना सम्मान है यहां कि नेता का सियासी जन्म ही 40-50 की उम्र में होता है। वह सठियाने तक मंत्री बने, तो दूसरे आश्चर्य जताते हैं, ‘फलाने ने गजब की तरक्की की है! इतनी जल्दी जिम्मेदारी का पद पा लिया?’

बात में दम है। ‘फलाने’ की राजनीतिक आयु अभी 20 वर्ष ही तो है। कहीं असमय ही कंधे झुक न जाएं। सिर्फ स्थापित खानदानों के चिराग इस उसूल के अपवाद हैं। वे जन्मजात नेता होते हैं। सौभाग्य से उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। सत्ता में महत्ता के बावजूद समाज में वृद्ध असुरक्षित हैं। कुछ संयुक्त परिवार के विघटन को इसका दोषी मानते हैं, तो कुछ नई पीढ़ी की महत्वाकांक्षा को। 80 के दशक में हर मां-बाप की हसरत थी कि उनका लाड़ला ‘डॉलर’ या ‘पाउंड’ कमाए। बेटे की विदेश में नौकरी को बुजुर्गवार अपनी इज्जत में इजाफा समझते। वह भूल जाते कि बेटा वहां बसा, तो वहीं का हो जाएगा। वाशिंगटन या लंदन से दिल्ली या लुधियाना पहुंचना, गाजियाबाद या मुंबई के समकक्ष नहीं है। किराये की कीमत कोई भूल भी जाए, तो छुट्टी की किल्लत है। बुढ़ापे को रोजमर्रा की देखभाल की दरकार है। पुराना सेवक तक सेफ नहीं है। कोई भरोसा नहीं है कि कब गटई दबाकर चंपत हो ले।
पारस्परिक संबंध जर्जर होने के भौतिक समय में बूढ़ों की दिक्कतें बढ़ी हैं। खून के रिश्ते स्नेह नहीं, लेन-देन पर निर्भर हैं। घर, जमीन-जायदाद झटककर कल तक के सगे भी एकाएक अजनबी बन जाते हैं। हम दूर के अपने रिश्तेदार वृद्ध के संकट से परिचित हैं। जब जाओ, वह विदेश में बसे बेटे का लाया लैपटॉप गर्व से हमें दिखाकर बताते कि अब वह उससे बस ‘चैट’ भर दूर हैं। एक दिन अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह चल बसे। सब अकेले आते और अकेले ही जाते हैं। पर इतने अकेले तो न जाएं। केंद्रीय मंत्रिमंडल औरों का न सही, अपने हमउम्रों का ही खयाल करे। हर शहर में कम से कम एक ढंग का वृद्धाश्रम ही बनवा दे।

 
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