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चिंता से मुक्ति की राह
First Published:09-12-12 10:49 PM
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यह आज के युग की सबसे साधारण मानसिक क्रिया है। इसे आप और हम रोजाना करते हैं और अपना बहुमूल्य समय नष्ट करते हैं। विश्व में ऐसा कोई नहीं होगा, जिसने कभी चिंता न की हो। बच्चे, बूढ़े, जवान, सभी ने चिंता की चिता पर बैठकर अपने आपको जलाया है। चिंता करना तो जैसे हमारा स्वभाव बन चुका है। कई लोगों का मानना है कि चिंता करना अच्छी बात है, क्योंकि इससे आप सामने वाले के प्रति अपना प्यार व स्नेह जताते हैं। पर सच यह है कि चिंता हमारे काल्पनिक संकल्पों की उपज है, जो हमारे भीतर की कुदरती चेतना और रचनात्मकता को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। हैरत की बात यह है कि हममें से अधिकतर लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि चिंता करने से हमारे समय और शक्तियों का क्षय होता है, बावजूद इसके हम उससे मुक्त नहीं हो पाते। इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी चिंता करने की एक प्रथा चली आ रही है। बचपन से ही माता-पिता बच्चों में यही संस्कार डालते हैं कि चिंता करना अच्छा है, परंतु यदि एकांत में बैठकर सोचें, तो हमें ज्ञात होगा कि चिंता हमारे अंदर डर की भावना उत्पन्न करती है, जबकि परवाह करना या देखभाल करना हमारे अंदर प्यार की भावना उत्पन्न करता है। चिंता और देखभाल में जमीन-आसमान का फर्क है।

वास्तव में, हम स्वार्थवश अपनी खुद की ही चिंता करते हैं, न कि किसी और की। इसका मूलभूत कारण है हमारे अंदर में पैठी असुरक्षा की भावना। आजकल हम अखबार, टेलीविजन के माध्यम से बुरी खबरों को पढ़, देखकर एक काल्पनिक भय में जीने लगते हैं। ऐसी मन:स्थिति के साथ जीना कई लोगों को अब मुश्किल लगने लगा है। ऐसे में, चिंता मुक्त होने का रामबाण इलाज है कि ‘वर्तमान में जीना सीखें।’ नकारात्मक भविष्य और पीड़ादायक भूतकाल के बारे में न सोचकर केवल अपने सुनहरे वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें।
ब्रह्मकुमार न्रिकुंज

 
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