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माफ करें, मेरा मुल्क बिकाऊ नहीं है
शशि शेखर shashi.shekhar@livehindustan.com First Published:08-12-12 06:49 PM

क्या आपने संसद के दोनों सदनों में इस हफ्ते किराना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर हुई बहस टेलीविजन पर देखी? यदि नहीं, तो कृपया लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही जरूर पढ़िए। आप पाएंगे कि हमारे नेताओं के शब्द खोखले हो गए हैं और विचार भोथरे। न उनके विरोध का कोई अर्थ है और न समर्थन पर कोई सार्थक तर्क।
मैं जब से संसद में हुई बहस को पढ़, देख और सुन रहा हूं, तब से कुछ शब्द मुझे आक्रांत करते रहे हैं। लगभग सभी पार्टियों ने कभी न कभी यह जरूर कहा है कि सरकार ‘देश बेच’ रही है। कभी किसी को लगता है कि हमारे यहां ‘असली आजादी’ नहीं है, तो कभी देश के गरिमामय सदनों में आजादी छिन जाने के तथाकथित खतरे को हौव्वा बनाकर पेश किया जाता है। ध्यान रखें, आज जो सरकार में हैं, कभी विपक्ष में थे। जो विपक्ष की बेंचों पर बैठकर शब्दों के तीर चला रहे हैं, वे कभी सरकार में हुआ करते थे। विदेशी पूंजी के प्रवाह और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन पर सबकी राय एक-सी है, फिर भी हंगामा बरपा है। क्या देश के लोग इस सियासी नौटंकी का आनंद उठाते है? या, वे भी इससे उकता गए हैं? अगर वे राजनेताओं से इतने ही आजिज आ गए हैं, तो फिर उन्हें वोट क्यों देते हैं? क्या इस देश का आम आदमी मतिभ्रम का शिकार है या फिर उसके पास कोई सार्थक विकल्प नहीं है? राजनीति और आम आदमी के बीच की भावनात्मक डोर तभी मजबूत होगी, जब हम कथनी और करनी के फर्क को महसूस न होने दें। अफसोस! ऐसा नहीं हो रहा है।

मेरी समझ में नहीं आता कि हमारे सियासी महाबली हमेशा भय की सियासत क्यों करते हैं? कभी अल्पसंख्यकों को इस बात से डराया जाता है कि अगर अमुक कानून बन गया, तो बहुसंख्यक तुम्हें जीने नहीं देंगे। तत्काल इसका जवाब गढ़ लिया जाता है कि कुछ लोग तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं। मुगलों के समय में ऐसा होता, तो कोई अचरज नहीं। अंग्रेजों ने अगर इस नीति को कूटनीतिक ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया, तो गिला कैसा? वे परदेसी थे और फिर उस समय की रवायतें अलग थीं। क्या 21वीं शताब्दी में ऐसा संभव है? अगर नहीं, तो फिर हमें हर बार क्यों गुलामी का डर दिखाया जाता है?

आप भूले नहीं होंगे। जॉर्ज फर्नाडीस ने जनता पार्टी के काल में कोका कोला को हिन्दुस्तान से बोरिया बिस्तर बांधने पर मजबूर कर दिया था। उसके बाद 1993 में उसे फिर से मुल्क में कारोबार की अनुमति दी गई। पेप्सी तब तक अपने पांव यहां जमा चुकी थी। आगरा में कोक की दोबारा लांचिंग के वक्त मैं वहीं रहता था। अपने नेताओं के क्रांतिकारी भाषण सुनकर तमाम लोगों के दिल धड़क रहे थे। इसी शहर में कभी सर थॉमस रो को जहांगीर ने भारत में तिजारत की इजाजत दी थी। इस राजाज्ञा के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के नुमाइंदों ने एक बार पैर पसारने शुरू किए, तो फिर वे रुके नहीं। व्यापारी बनकर आए अंग्रेज हमारे आका बन बैठे। इसीलिए समझदार आगरावासियों के दिल धड़क रहे थे। कहीं फिर से पराधीनता के विष बीजों की बुवाई की शुरुआत हमारी धरती से तो नहीं हो रही?

दो दशक बीत चले हैं। आज हम दावे से कह सकते हैं कि बिला वजह का डर हम पर थोपा गया था। सवाल दोहरा रहा हूं, हमारे सियासतदां भय की राजनीति क्यों करते हैं? जवाब जानने के लिए अतीत के पन्ने पलटने होंगे। मुगल वंश के जनक से बात शुरू करते हैं। बाबर भले ही बाहर से आया हो, पर जब एक बार उसने निर्णय कर लिया कि अब लौटकर काबुल नहीं जाना है, तो तय हो गया था कि उसकी आने वाली पुश्तें इसी सरजमीं पर जन्म लेंगी, यहीं दफन होंगी। इसके उलट अंग्रेज सिर्फ ‘सोने की चिड़िया’ लूटने आए थे। इसीलिए उन्होंने अपने फायदे के लिए नई रीति-नीति का निर्माण किया। आज जब नेता गुलामी की बात करते हैं, तो मुख्य तौर पर वे अंग्रेजी हुकूमत की डरावनी घटनाओं के जरिये हमें डराने की कोशिश करते हैं। पिछले दिनों राज्यसभा में एक माननीय सदस्य ने बहस के दौरान जो कहा, उसका आशय यह लगाया जा सकता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता से हुकूमत की शुरुआत की थी।

उन्हें दिल्ली तक आने में वक्त लगा, पर हम वालमार्ट को सीधे राजधानी पर कब्जे की दावत दे रहे हैं। क्या यह सच है? उस दिन कोका कोला की लांचिंग के वक्त सिहरते हुए मैंने भी थॉमस रो को याद किया था, पर क्या कोक और पेप्सी ने हमें गुलाम बना लिया? कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी देश पर कब्जा करने के लिए जरूरी होता है उसके संस्कारों पर चोट कर आत्मा को बंधक बना लेना। कोक ने पारले के जिन ब्रांड्स को खरीदा था, उसमें एक पेय ‘थम्स-अप’ को तो वह अभी तक खत्म नहीं कर सका है।

ऐसे में, यह आशंका करना कि कोई वालमार्ट आकर हमारे कफन-दफन का इंतजाम कर देगा, ज्यादती है। इस देश का इतिहास उठा देखिए। बाहर से आक्रमणकारी आकर या तो यहां बस गए या फिर लूटकर चले गए। जो धर्म हुकूमत के दबाव के चलते यहां शुरू हुए, उन्होंने भी अपने को कायम रखने के लिए पुरानी परंपराओं को अपना लिया। हम हिन्दुस्तानी संस्कारों से भले ही आक्रामक न रहे हों, पर अपनी अस्मिता की रक्षा करना हमें खूब आता है। सिकंदर से चीन की लाल सेना तक परदेसी आक्रमणों के परिणामों पर नजर डालिए। हमने भले ही सामरिक रणनीति न सीखी हो, पर यह सच है कि अंग्रेजों के अलावा हमें जो गुलाम बनाने आए, वे यहीं के होकर रह गए।

जमाना बदल गया है। वालमार्ट या ऐसी अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब अपनी सेनाएं लेकर नहीं चलतीं। वे जिस देश में जाती हैं, उसी के कानूनों के तहत काम करती हैं। कभी-कभी सरकारें यूरो या डॉलर के लालच में अपने ही कायदों में ढील दे देती हैं, फिर भी उन्हें धरती के आचार-विचार, व्यवहार और संहिता का पालन करना होता है। क्या हमारी 121 करोड़ की आबादी और हुक्मरां इतने कमजोर हैं कि कोई विदेशी कंपनी उनकी आवाज और अंतरात्मा को कुचलकर रख देगी? यकीन रखिए, ऐसा नहीं होने जा रहा।

पर राजनीति और नेताओं का क्या कीजिएगा? भय, उन्माद, अलगाव और नफरत फैलाकर वे अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। वे हमेशा ऐसा कर पाएंगे, इसमें मुझे संदेह है। भरोसा न हो, तो हिंदी और अंग्रेजी विरोधी आंदोलनों को याद कर देखिए। एक समय था, जब दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदी बोलने पर अभद्रता का शिकार बनने का खतरा रहता था। आज पूरे देश में कहीं भी चले जाइए, भाषायी नफरत की दीवारें सिरे से गायब मिलेंगी। हिंदी तो भारतीय भाषा है, 1960 के दशक में अंग्रेजी के खिलाफ भी ऐसा ही माहौल बनाने की कोशिश की गई थी। इंग्लिश इससे खत्म नहीं हुई, बल्कि और बुलंद हो गई। दूसरों की अच्छाई से सबक लेना हिन्दुस्तानियों की संस्कृति का हिस्सा है। पता नहीं, हमारे नेताओं को इतनी सी बात भी समझ में क्यों नहीं आती?

 

 
 
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