शुक्रवार, 24 अक्टूबर, 2014 | 15:04 | IST
  RSS |    Site Image Loading Image Loading
ब्रेकिंग
कांग्रेस में बदल सकता है पार्टी अध्‍यक्षचिदंबरम ने कहा, नेतृत्‍व में बदलाव की जरूरत हैदेहरादून शहर के आदर्श नगर में एक ही परिवार के चार लोगों की हत्यागर्भवती महिला समेत तीन लोगों की हत्याहत्याकांड के कारणों का अभी खुलासा नहींपुलिस ने पहली नजर में रंजिश का मामला बतायाकोच्चि एयरपोर्ट पर जांच जारीविमान पर आत्मघाती हमले का खतराएयर इंडिया की फ्लाइट पर फिदायीन हमसे का खतरामुंबई, अहमदाबाद, कोच्चि में हाई अलर्ट
विश्व का टॉप लेखक
सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार First Published:08-12-12 06:45 PM

हिंदी में विश्व लेखक होने लगे हैं। वे विश्व में रहते हैं। विश्व उनमें रहता है। वे विश्व की कहते हैं। विश्व उनकी कहता है। विश्व में सात-आठ अरब लोग नहीं होते। तीन-चार मित्र लेखक होते हैं। बाकी दुनिया अस्तित्वहीन होती है। हिंदी के ऐसे सेमी-फॉरेन लेखक फॉरेन में छपते रहते हैं। यह भी उन्हीं के बताए मालूम पड़ता है, वरना हिंदी वाला तो लोकल की भी खबर नहीं रखता, ग्लोबल की क्या रखेगा? और वह फॉरेन लेखक ही क्या, जो अपनी खबर को दूसरे के लिए जरूरी न बना दे। ऐसे लेखक जब भी मिलते हैं, तो यह बताना नहीं भूलते कि इधर उनकी उस कहानी का जर्मन में अनुवाद हो रहा है, उधर उसी किताब का फ्रेंच में अनुवाद हो रहा है।

अंग्रेजी में तो कब की छप ही चुकी है। फिन्नी में उस पर फिल्म बन रही है। बनाने वाले हैं मार्टिन स्कार्सिस, कांट्रेक्ट हो गया है। अगले महीने हॉलीवुड जाना है। अनूदित लेखकों की एक श्रेणी ही बन चली है। उनकी सेमी-फॉरेन कृतियों का हिंदी में अनुवाद कब होगा? कब हमें देखने को मिलेंगी? ऐसे लेखक हिंदी को मुंबई लोकल की तरह भीड़ से भरा देख ग्लोबल लाइन पकड़ते हैं। लोकल से ग्लोबल होने की प्रक्रिया में दिल्ली और उसके दूतावासों की महती भूमिका है। कई दूतावासों का दिल हिंदी की दीन दशा देखकर हर शाम द्रवित होता रहता है।

वे हिंदी के प्रतिभापुत्र-पुत्रियों की ‘कारयित्री’ प्रतिभा को ‘भावयित्री’ प्रतिभा तक ले जाने को उद्यत रहते हैं। जिस माल का अपने यहां कोई लेवल नहीं होता, वही उन्हें भाता है। इससे सिद्ध होता है कि फॉरेन का ‘टेस्ट’ भी उतना ही घटिया है, जैसा कि अपने यहां है। साहित्य की विश्व रिटेल मंडी में सब माल बाईस पसेरी बिकता है। दिल्ली में विश्व लेखक बनने के कई मार्ग हैं।

शांति मार्ग और चाणक्यपुरी इस काम में बड़ी भूमिका निभाते हैं। एक तरल-सी शाम को दुभाषिए अपने परिसर में हिंदी लेखक की प्रतिभा को अपनी भाषा में इस तरह बताते हैं, ‘आवर  कंट्री में बी यूअर जैसा हो ड़हा है, एक लेकक हो गया है, जो एक्जेक्टली आपके ङौसा लिकते है। क्यू नई हमाड़ा आफका एक-एक राइटर का आडान-पड्रान, यू नो एक्सचेंज हो झाए? इन दिनों हमारा आफका फ्रेंडशिप भौत इंपोर्टेट है!’ हिंदी वाला अपनी हिंदी को विदेशी की खातिर तोड़-फाड़कर कह उठता है- ‘ओ या..या! स्यूअर -स्यूअर! मेरा ये किताब हय, वो किताब हय, कितना है, इडर हिंडी में क्वालिटी नहीं है।

इडर ब्लडी हिंडी वाला कोच्छ नहीं जानता। आप कितना जानता, इसलिए अब आप ही कराता।’ ऐसे होनहार विश्व लेखक की आंखों में तुरंत विदेश यात्रा डॉलर और विदेशी गर्ल से दोस्ती का दरवाजा बेआहट खुलता है। हिंदी के लेखक की कल्पना में विश्व ‘सेक्स शराब और डॉलर’ में तैरता रहता है। वह गोता मारने को व्याकुल है। विश्व कोटि का लेखक विश्व कोटि की बातें उचारता है। इस क्रम में हिंदी ‘ब्लडी हिंदी’ हो जाती है। वह रुपये की बात न कर डॉलर-यूरो की बात करता है और बोरखेस-मारकेस के बारे में इस तरह बताता है, जैसे वे उसके पढ़ाए बच्चे हों। जब वह ब्लडी हिंदी में लौटता है, तो देखता है कि उसकी सीट लपके पहले ही हड़प चुके हैं। वह सोचता है : काश! वह हिंदी में न होकर स्पेनी में होता, तो विश्व का टॉप लेखक जरूर होता।
 
 
|
 
 
टिप्पणियाँ