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बंद आंखों से विरोध की क्रांतिकारिता
राजेन्द्र धोड़पकर, एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान
First Published:07-12-12 07:31 PM
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खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर सोशल मीडिया पर उग्र और नाराज टिप्पणियों की भरमार है। ज्यादातर टिप्पणियां वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों की हैं। वामपंथी और दक्षिणपंथी यूं भी सोशल मीडिया पर कुछ ज्यादा ही सक्रिय होते हैं, लेकिन दोनों अलग-अलग दिशाओं में होते हैं। अब शोर कुछ ज्यादा इसलिए है, क्योंकि दोनों एक ही दिशा में साथ-साथ वार कर रहे हैं। दक्षिण या वाम विचारधारा वाले लोगों की एक समस्या यह होती है कि वे कुछ उग्र और अतिवादी बात करते हैं। किसी का विरोध करते हैं, तो ऐसा जैसे मनुष्यता का उससे भयानक दुश्मन कोई हुआ ही नहीं। किसी बात का समर्थन करते हैं, तो ऐसा जैसे दुनिया में उससे ज्यादा क्रांतिकारी और कोई नहीं। विचारों को लेकर दोनों ज्यादा उत्साहित रहते हैं और तथ्यों के मामले में उनका हाथ थोड़ा तंग रहता है।

फिलहाल दक्षिण या वाम क्रांतिकारियों का गुस्सा मुलायम सिंह यादव और मायावती पर केंद्रित है। सबका मानना है इन नेताओं ने कोई बड़ा विश्वासघात या बेईमानी की है। एक आरोप यह है कि ये बिक गए हैं। ऐसा नहीं है कि पार्टियां या नेता बिकते नहीं हैं या भ्रष्ट नहीं होते। लेकिन एक बात साफ है, जो भी भारत जैसे देश में इतने साल से सफल राजनीति कर रहे हैं, वे जानते हैं कि उनका दीर्घकालीन हित किसमें है या राजनीति में जिन समूहों का वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, उनका भला किस तरह होगा। इसलिए यह मानना कि सिर्फ सीबीआई के दबाव में या किसी लेन-देन के चलते सपा या बसपा ने यह रुख अपनाया, राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। इस बात को दलित विचारक चंद्रभान प्रसाद ने जिस परिप्रेक्ष्य में देखा है, उससे मामला कुछ खुल सके। शायद हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि मुलायम सिंह यादव और मायावती के आधारभूत समर्थक समूह या जातियां हैं, उन पर एफडीआई का क्या फर्क पड़ेगा। क्या पिछड़ों और दलितों को खुदरा व्यापार में एफडीआई आने से कोई नुकसान होगा या फायदा होगा? चंद्रभान प्रसाद का तर्क यह है कि वाणिज्य, उद्यम में भारत में जो परंपरागत जातियों की जकड़बंदी है, वह दलित उद्यमियों को रोकती है।

जब आधुनिक या नई व्यवस्थाएं इस जकड़बंदी को तोड़ती हैं, तभी दलित उद्यमियों को घुसने का मौका मिलता है, इसलिए एफडीआई का आना दलितों के लिए लाभप्रद है। मुलायम सिंह यादव या मायावती ने जो सस्पेंस बनाए रखा था, वह राजनीतिक चतुराई थी। मुलायम सिंह और शरद यादव के रुख के पीछे उनका समाजवादी अतीत भी काम कर रहा होगा। शायद शरद यादव के उग्र तेवर इसलिए भी हों, क्योंकि कई व्यापार करने वाली जातियां बिहार में पिछड़ों की श्रेणी में आती हैं। भाजपा को तो दुकानदारों की पार्टी कहा ही जाता है, इसलिए उसका रवैया समझा जा सकता है।

अब अचानक सबको भारतीय खुदरा व्यापार की श्रेष्ठता याद आने लगी है। शरद यादव ने तो एक लेख में लिखा ही था कि भारतीय खुदरा व्यापार व्यवस्था इतनी अच्छी है कि उसे बदलने की कोई जरूरत नहीं है। लोग बता रहे हैं कि वालमार्ट किसानों से दो रुपये की चीज खरीदकर 20 रुपए में बेचेगा, जैसे भारतीय आढ़तिए और बिचौलिए किसानों का भला करने में लगे हों। यही लोग जब महंगाई का रोना रोते हैं तो बताते हैं कि जो टमाटर किसान से चार रुपए किलो खरीदा जाता है वह मंडी में पचास रुपए के भाव बिकता है। बहुराष्ट्रीय निगम कोई आदर्श व्यापारी नहीं हैं लेकिन भारतीय बिचौलिए भी न किसान का हित करते हैं और न उपभोक्ता का। वालमार्ट के यहां कर्मचारियों के हितों के मामले में कैसे शॉर्टकट मारे जाते हैं इस पर बात जरूर होनी चाहिए लेकिन थोक और खुदरा दुकानों पर बिना एक भी छुट्टी के सुबह से रात तक काम करने वाले छोटुओं की स्थिति क्या उनसे बेहतर है?

सामान्य व्यावहारिक ज्ञान हमें बताता है कि बड़े उद्यमों में कर्मचारियों के हितों की ज्यादा रक्षा हो सकती है बनिस्बत छोटे उद्यमों के। बड़े पूंजीपतियों का विरोध हम करें लेकिन यह भी सोचें कि अगर अपने बेटे के लिए नौकरी चुननी हो तो हम किसी बहुराष्ट्रीय निगम को चाहेंगे या मायापुरी की उस छोटी फैक्ट्री या दुकान को, जिसे वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों गौरवान्वित करते आ रहे हैं। जो हमारे बेटे के लिए ठीक नहीं है वह देश के लिए क्यों अच्छा नहीं है?
संसद से लेकर फेसबुक तक शोर है कि ईस्ट इंडिया कंपनी की वापसी हो रही है, देश को फिर से गुलामी की ओर धकेलने का षडय़ंत्र हो रहा है। इससे पता लगता है कि काफी सारे लोग समय में किसी एक विचारधारात्मक बिंदु पर अटक गए हैं। जब 22 साल पहले उदारीकरण शुरू हुआ था तब भी यही बात हो रही थी।

उसके पहले तो भारत के बाहर के हर तत्व को उसी शक से देखा जाता था, जैसे बाल ठाकरे गैरमराठियों को देखते थे। उदारीकरण के बाद दसियों नहीं, सैकड़ों-हजारों विदेशी उद्यम विदेश से आए, उनमें से कई इतने बड़े थे कि अच्छे खासे देशों का वार्षिक बजट उनमें समा जाए। जब इतने सारे बहुराष्ट्रीय निगमों के आने से देश नहीं बिका तो दो-चार और निगमों के आने से कैसे बिकेगा? यह भी हुआ है कि भारत से बहुत छोटे कई देशों में वालमार्ट नहीं चला, और अंतत: उसे दुकान उठा लेनी पड़ी। भारत में अपने इतने सारे खुदरा व्यापार निगम हैं, उन्होंने कितना व्यापार छोटी दुकानों से छीना है? वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही हमारे देश में अतीतजीवी हैं। वर्तमान और भविष्य उनकी विचारधारा में नहीं अंटता।

वे हर नई चीज का विरोध करते हैं और जब वह चीज पुरानी हो जाती है, तो फिर उसे अपना लेते हैं, और फिर उसका पक्ष लेकर आने वाली चीज का विरोध करते हैं। कंप्यूटर आया, तो उसका सबसे ज्यादा उग्र विरोध करने वाले यही लोग थे। पश्चिम बंगाल में टाइपराइटर अभी-अभी तक सक्रिय था। अब कंप्यूटर और सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़कर पूंजीवादी व्यवस्था को कोसने वाले ये ही लोग हैं। संभवत: एफडीआई न उतनी क्रांतिकारी सिद्ध होगी, जितना सरकार का दावा है, और न ही देश में फिर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन होने जा रहा है। भारत का वास्तविक अनुभव यही बताता है कि भारत के विशाल खुदरा उद्योग में वे ‘भी’ रहेंगे, वे ‘ही’ नहीं रहेंगे। वालमार्ट के आने से कुछ चीजें बदलेंगी, कुछ वे हमसे सीखेंगे, कुछ हमारे व्यापारी उनसे सीखेंगे। कुछ पुराने ढांचे कुछ हद तक टूटेंगे, और कुछ नए ढांचे बनेंगे। आंख मूंदकर किसी का समर्थन भी अच्छा नहीं, लेकिन विरोध भी तो उतना ही अतार्किक हो सकता है, भले ही क्रांतिकारी लगे।

 

 
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