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जिनका समर अभी शेष है
उर्मिल कुमार थपलियाल First Published:07-12-12 07:30 PM

वह इधर राजनीति और साहित्य, दोनों में सस्पेंड चल रहे थे। संसद स्वयं में खुदरा व्यापार हो चुकी थी और ‘भीतर खुंदक, बाहर समर्थन’ वाले वालमार्ट की गोद में लैपटॉप की तरह विराज चुके थे। अर्जुन जैसे केजरीवाल ने शरशैय्या पर लेटे अन्ना हजारे रूपी भीष्म पितामह को बाण द्वारा पानी पिलाने से ना-नुकर कर दिया था। उधर एक अन्य समर में मोदी मुगदर घुमाते हुए दूसरों के धर्म की हानि करने में लगे थे। राजनीति का हर गंजा अपनी चोटी खोलकर दूसरों की जड़ों और जटाओं में मट्ठा डालने में व्यस्त था। ऐसे में निठल्ला साहित्य करता तो क्या? वह हाशिये में चला गया। मेरे साहित्यिक मित्र स्थगित अवस्था में थे। साहित्य और राजनीति में उनका आना जाना था, अत: वह एक जगह अनुपस्थिति और दूसरी जगह वॉक आउट की स्थिति में थे। यानी सब चकाचक।

वैसे भी उनका साहित्य होल सेल किस्म का था। खुदरा व्यापार वृत्ति के कारण वह प्रत्येक अखबार और पत्रिका में छपते रहते थे। वह सूचना विभाग में थे और हर पत्रिका को विज्ञापन दिलवाते थे। सरकार में होने के कारण राजकवि होना उनकी नियति थी। एक बार उनके एक कवि मित्र ने लिख दिया- ‘खबरों का मुंह विज्ञापनों से बंद है।’ उन्होंने एक राजकीय पुरस्कार दिलाकर उस कवि का ही मुंह बंद करवा दिया।

इधर राजनीति में उनका पव्वा फिट नहीं हो रहा था, सो उन्होंने पूरी की पूरी बोतल फिट करने की कोशिश की। वह सरकारी सेवा में थे, सो सीधे राजनीति में कूदने से पहले कपड़े उतारना जरूरी था, सो वह राजनीति में पंचस्नान करते और किसी बड़े मंत्री के सूचना अधिकारी हो जाते। अभी उन्होंने अपने मंत्री का भाषण लिखा- विधेयक पास होकर रहेगा। साइकिल हो या हाथी, दोनों हमारी सवारी हैं और बारी-बारी से दरवज्जो पर खड़ी हैं। इसका तत्काल प्रभाव हुआ और वह सस्पेंड हो गए। यह उनका तीसरा सस्पेंशन था। यह सरकारी था, सो प्रभावहीन था। फिलहाल वह राजनीति से विमुख होकर साहित्य में सक्रिय हैं और प्राय: सभी दलों के लिए चुनावी नारे लिख रहे हैं। कहते हैं- उनका समर हमेशा की तरह अब भी शेष है।

 
 
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