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दो अतियों के बीच
राजीव कटारा First Published:07-12-2012 07:29:32 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

बड़े अरमानों से वह प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। अपनी पूरी टीम को भी जुटा दिया था। लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि सब कुछ किसी और दिशा में जा रहा है। उनकी नींद उड़ने लगी थी। कोई भी प्रोजेक्ट हमेशा सोची हुई लकीर पर नहीं जाता। शायद इसीलिए डॉ. रिक हार्वे कहते हैं, ‘कुछ भी करने से पहले सोच लो कि उसमें बेहतरीन क्या हो सकता है? और सबसे खराब क्या हो सकता है? तब हम बेकार की चिंताओं से बच जाते हैं।’ वह सैन फ्रैंसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में हैल्थ ऐजुकेशन और हॉलिस्टिक हैल्थ के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। बेहतरीन होने पर तो अच्छा लगना ही है। अगर कुछ बहुत खराब भी होता है, तो हमें उतना बुरा नहीं लगता। हम उसके लिए भी तैयार होते हैं। यह तैयार होना सचमुच मायने रखता है। अगर बहुत अच्छा हो जाता है, तो हम बौरा नहीं जाते। और बुरा होता है, तो हम ढह नहीं जाते। कुल मिलाकर, हम दोनों हालात के लिए तैयार होते हैं। हम जब किसी काम में जुटते हैं, तो अक्सर अच्छा ही अच्छा सोचते हैं। बुरा सोचना हमें अच्छा नहीं लगता। इसलिए उस ओर हम देखते ही नहीं। कभी-कभी चीजें जब खराबी की ओर जाने लगती हैं, तो हम परेशान होते हैं।

हमें जोर का झटका लगता है। यही जोर का झटका हमें धीरे से लगे। उसके लिए जरूरी है कि हम बहुत खराब को भी जेहन में रख लें। तब शायद हमें बुरा तो लगेगा, लेकिन कुछ लुटा हुआ-सा महसूस नहीं होगा। हमारी जिंदगी में अक्सर चीजें कहीं बीच में ही होती हैं। बेहतरीन और बर्बादी के बीचोबीच ही हम खड़े होते हैं। दोनों अतियों पर अगर हम सोच लें, तो फिर बात ही क्या है? तब हम इधर-उधर हिल-डुल तो सकते हैं, लेकिन ठोस जमीन पर खड़े रहते हैं। जिंदगी जीने के लिए यही ठोस जमीन जरूरी होती है।  

 
 
 
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