ओमप्रकाश चौटाला को दिल्ली हाईकोर्ट ने दी जमानत IPL स्पॉट फिक्सिंग मामले में विंदू दारा सिंह गिरफ्तार चेन्नई में सट्टेबाजी मामले में प्रमुख आरोपी गिरफ्तार आइगेट ने यौन उत्पीड़न केस में CEO को किया बर्खास्त इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की राजेश तलवार की याचिका भारत-चीन सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान खोजने में सक्षम IPL मैचों पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार IPL मैचों पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार IPL मैचों पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार IPL मैचों पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
छोटे संदेशों की लंबी यात्रा
चाल्र्स आर्थर, ब्रिटिश पत्रकार
First Published:06-12-12 07:11 PM
इसने लोगों की जिंदगियां भी बचाई हैं और शादियां भी तुड़वाई हैं। इसने दुनिया को एक नई तरह की भाषा भी दी है व टेलीफोन कंपनियों को अरबों रुपये का मुनाफा भी दिया है। छोटे-छोटे लिखित संदेशों वाली यही एसएमएस जब अपना 20वां जन्मदिन मना रही है, तो हर जगह एक ही सवाल है कि स्मार्टफोन और भारी डाटा के आदान-प्रदान वाले इस युग में ऐसे संदेश कब तक जिंदा रहेंगे।
यह सच है कि जब से एसएमएस का चलन शुरू हुआ है, साल दर साल ऐसे संदेशों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। दुनिया के कई देशों में तो इसकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि लगता है कि जैसे यह आखिरी बुलंदी हो। इसके साथ ही यह भी हुआ है कि जो नई पीढ़ी पहले खूब सारे एसएमएस भेजा करती थी, वह अब व्हाट्सएप और ब्लैकबेरी मैसेंजर या बीबीएम का इस्तेमाल करने लगी है। इनकी खासियत यह है कि ये मुफ्त में उपलब्ध हैं। एंडर्स एनालिसिस में काम करने वाले टेलीकॉम विशेषज्ञ बेनेडिक्ट इवान का कहना है, ‘अब ऐसी बहुत से सेवाएं उपलब्ध हैं। ऐसी 25 सेवाएं तो मैंने खुद गिनी हैं, जिनके इस्तेमाल करने वालों की कुल संख्या ढाई अरब है।
हालांकि, बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके एकाउंट एक से ज्यादा जगहों पर हैं। दस ऐसी हैं, जिनके इस्तेमाल करने वाले एक अरब से ज्यादा हैं। इनमें ब्लैकबेरी शामिल नहीं है, इसे सिर्फ छह करोड़ लोग ही इस्तेमाल कर रहे हैं।’
ऐसा पहला संदेश 1992 में ब्रिटिश इंजीनियर नील पैपवर्थ ने दिसंबर के पहले हफ्ते में भेजा था। कंप्यूटर से भेजा गया यह संदेश था ‘मैरी क्रिसमस।’ यह संदेश कंप्यूटर नेटवर्क के जरिये रिचर्ड जर्विस के वोडाफोन कनेक्शन पर भेजा गया था, जो उन्हें उनके आर्बिटल-901 मोबाइल फोन पर मिला था। लेकिन नील पैपवर्थ को उनके इस संदेश का जवाब नहीं मिल सका था, क्योंकि उस समय मोबाइल फोन से ऐसे संदेश भेजने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। एक साल बाद जब नोकिया ने अपना पहला मोबाइल फोन बाजार में उतारा, तो मोबाइल फोन से एसएमएस भेजने की सुविधा भी उपलब्ध हो गई। संदेश भेजने की यह सुविधा शुरुआत में बिलकुल मुफ्त थी, लेकिन दिक्कत यह थी कि किसी एक नेटवर्क से जुड़े लोग ही आपस में इस तरह के संदेश भेज सकते थे। साल 1994 में वोडाफोन ने इसी पर शेयर प्राइज अलर्ट सेवा की शुरुआत की। यह सेवा लोगों को शेयर कीमतों की जानकारी देने के लिए थी। इसके बाद साल 1995 में टेजिक सिस्टम की शुरुआत हुई, जिसे टी-नाइन कहा जाता है। यह सिस्टम पहले अक्षर से अंदाज लगाता है कि आप कौन-सा शब्द लिखना चाहते हैं। इसके शुरू होते ही एसएमएस ने एकदम से तेजी पकड़ ली। इसके बाद तो इस सेवा को व्यावसायिक स्तर पर शुरू कर दिया गया। हालांकि, शुरुआत में यह सेवा मुफ्त ही बनी रही, क्योंकि टेलीकॉम कंपनियां यह तय नहीं कर पा रही थीं कि उन पर सेवा शुल्क किस तरह से लिया जाए। लेकिन जैसे ही ऐसे संदेशों की संख्या बढ़नी शुरू हुई, मुफ्त सेवा का जमाना खत्म हो गया। नई सदी के पहले साल में ब्रिटेन में एक अरब से भी ज्यादा एसएमएस भेजे गए। जिस पर दस पेंस प्रति संदेश की दर से कंपनियों ने दस करोड़ पौंड से भी ज्यादा की कमाई की। हालांकि, ऐसे संदेश का आकार बहुत छोटा होता है, सिर्फ 128 बाइट। इस लिहाज से देखें, तो 650 मेगाबाइट की एक म्यूजिक सीडी की कीमत 60 हजार पौंड हो जाएगी। लेकिन ठीक उसी साल यह भी पता चला कि एसएमएस लोगों की जान बचाने का भी जरिया हो सकता है। बाली की लंबूक खाड़ी में 14 ब्रिटिश पर्यटक फंस गए थे, उन्हीं पर्यटकों में से एक लड़की ने इंग्लैंड में एसएमएस भेज कर इसकी जानकारी दी। और कुछ ही समय के भीतर वे सब बचा लिए गए। इसी तरह पहाड़ पर फंस गए एक पर्वतारोही को इसलिए बचाया जा सका कि उसने अपने फंसे होने का एसएमएस भेज दिया था। एसएमएस ने एक नई भाषा को जन्म दिया, जिसे ‘टैक्सट लैंग्वेज’ कहा गया। इसे भेजने में दो बड़ी समस्याएं थीं। एक तो संदेश में 160 से ज्यादा अक्षर या करैक्टर नहीं हो सकते और दूसरे, संख्याओं वाले की-पैड पर टाइप करना भी आसान नहीं होता। इसलिए शॉर्ट कट तलाशे गए, ऐसे शब्द बने जिसमें संख्याओं का इस्तेमाल होता है। अभिभावक शिकायत करने लगे कि उनके बच्चों की भाषा बिगड़ गई है, वे ठीक स्पैलिंग ही नहीं जानते। साल 2003 तक यही शिकायत अध्यापकों और परीक्षकों ने शुरू कर दी। 13 साल की एक लड़की ने अपने इम्तिहान में एक सवाल का पूरा जवाब ही उस भाषा में दिया, जिसे एसएमएस की भाषा कहा जाता है। यह कहा जाने लगा कि अंग्रेजी भाषा पर खतरा मंडरा रहा है। लेकिन अब खतरा अंग्रेजी भाषा पर नहीं मंडरा रहा, खतरा अब खुद एसएमएस पर ही मंडरा रहा है। स्मार्टफोन और डाटा सेवाओं के शुरू होने से वह व्यवस्था ही चरमराने लगी है, जो टेलीकॉम कंपनियों को एसएमएस से मुनाफा कमाने का मौका देती थी। इसके नए एप्लीकेशन एकदम मुफ्त हैं और जब आपको फोन के सिग्नल भी न मिल रहे हों, इनके संदेश तब भी भेजे जा सकते हैं। इस साल की शुरुआत में फिनलैंड के मोबाइल नेटवर्क सोनेरा ने बताया था कि क्रिसमस पर भेजे जाने वाले संदेश पिछले साल के मुकाबले एक करोड़ से घटकर 85 लाख हो गए। हांगकांग में क्रिसमस के संदेशों में 14 फीसदी की कमी आई। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इस तरह के संदेश अब विदा हो जाएंगे, या मोबाइल ऑपरेटर्स का भट्ठा बैठ जाएगा। एसएमएस से उन्होंने काफी पैसा कमाया है और अफ्रीका व भारत जैसे देशों में अगले सात-आठ साल तक और कमाते रहेंगे। और अगर यह खत्म हो ही जाते हैं, तो मोबाइल ऑपरेटर आप से पैसा हासिल करने का नया तरीका निकाल लेंगे। मसलन, वे डाटा ट्रांसमिशन की कीमत बढ़ा सकते हैं। लेकिन छोटे-छोटे संदेशों की कहानी यहीं खत्म नहीं होगी। ट्विटर पर भेजे जाने वाले संदेश भी तो ऐसे ही संदेश हैं। बस इन्हें भेजने का तरीका बदल जाएगा। एक-दूसरे को छोटे संदेश भेजना लोगों को अब भी ज्यादा सुविधाजनक लगेगा।
गाजिर्यन से साभार (ये लेखक के अपने विचार हैं)
ऐसा पहला संदेश 1992 में ब्रिटिश इंजीनियर नील पैपवर्थ ने दिसंबर के पहले हफ्ते में भेजा था। कंप्यूटर से भेजा गया यह संदेश था ‘मैरी क्रिसमस।’ यह संदेश कंप्यूटर नेटवर्क के जरिये रिचर्ड जर्विस के वोडाफोन कनेक्शन पर भेजा गया था, जो उन्हें उनके आर्बिटल-901 मोबाइल फोन पर मिला था। लेकिन नील पैपवर्थ को उनके इस संदेश का जवाब नहीं मिल सका था, क्योंकि उस समय मोबाइल फोन से ऐसे संदेश भेजने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। एक साल बाद जब नोकिया ने अपना पहला मोबाइल फोन बाजार में उतारा, तो मोबाइल फोन से एसएमएस भेजने की सुविधा भी उपलब्ध हो गई। संदेश भेजने की यह सुविधा शुरुआत में बिलकुल मुफ्त थी, लेकिन दिक्कत यह थी कि किसी एक नेटवर्क से जुड़े लोग ही आपस में इस तरह के संदेश भेज सकते थे। साल 1994 में वोडाफोन ने इसी पर शेयर प्राइज अलर्ट सेवा की शुरुआत की। यह सेवा लोगों को शेयर कीमतों की जानकारी देने के लिए थी। इसके बाद साल 1995 में टेजिक सिस्टम की शुरुआत हुई, जिसे टी-नाइन कहा जाता है। यह सिस्टम पहले अक्षर से अंदाज लगाता है कि आप कौन-सा शब्द लिखना चाहते हैं। इसके शुरू होते ही एसएमएस ने एकदम से तेजी पकड़ ली। इसके बाद तो इस सेवा को व्यावसायिक स्तर पर शुरू कर दिया गया। हालांकि, शुरुआत में यह सेवा मुफ्त ही बनी रही, क्योंकि टेलीकॉम कंपनियां यह तय नहीं कर पा रही थीं कि उन पर सेवा शुल्क किस तरह से लिया जाए। लेकिन जैसे ही ऐसे संदेशों की संख्या बढ़नी शुरू हुई, मुफ्त सेवा का जमाना खत्म हो गया। नई सदी के पहले साल में ब्रिटेन में एक अरब से भी ज्यादा एसएमएस भेजे गए। जिस पर दस पेंस प्रति संदेश की दर से कंपनियों ने दस करोड़ पौंड से भी ज्यादा की कमाई की। हालांकि, ऐसे संदेश का आकार बहुत छोटा होता है, सिर्फ 128 बाइट। इस लिहाज से देखें, तो 650 मेगाबाइट की एक म्यूजिक सीडी की कीमत 60 हजार पौंड हो जाएगी। लेकिन ठीक उसी साल यह भी पता चला कि एसएमएस लोगों की जान बचाने का भी जरिया हो सकता है। बाली की लंबूक खाड़ी में 14 ब्रिटिश पर्यटक फंस गए थे, उन्हीं पर्यटकों में से एक लड़की ने इंग्लैंड में एसएमएस भेज कर इसकी जानकारी दी। और कुछ ही समय के भीतर वे सब बचा लिए गए। इसी तरह पहाड़ पर फंस गए एक पर्वतारोही को इसलिए बचाया जा सका कि उसने अपने फंसे होने का एसएमएस भेज दिया था। एसएमएस ने एक नई भाषा को जन्म दिया, जिसे ‘टैक्सट लैंग्वेज’ कहा गया। इसे भेजने में दो बड़ी समस्याएं थीं। एक तो संदेश में 160 से ज्यादा अक्षर या करैक्टर नहीं हो सकते और दूसरे, संख्याओं वाले की-पैड पर टाइप करना भी आसान नहीं होता। इसलिए शॉर्ट कट तलाशे गए, ऐसे शब्द बने जिसमें संख्याओं का इस्तेमाल होता है। अभिभावक शिकायत करने लगे कि उनके बच्चों की भाषा बिगड़ गई है, वे ठीक स्पैलिंग ही नहीं जानते। साल 2003 तक यही शिकायत अध्यापकों और परीक्षकों ने शुरू कर दी। 13 साल की एक लड़की ने अपने इम्तिहान में एक सवाल का पूरा जवाब ही उस भाषा में दिया, जिसे एसएमएस की भाषा कहा जाता है। यह कहा जाने लगा कि अंग्रेजी भाषा पर खतरा मंडरा रहा है। लेकिन अब खतरा अंग्रेजी भाषा पर नहीं मंडरा रहा, खतरा अब खुद एसएमएस पर ही मंडरा रहा है। स्मार्टफोन और डाटा सेवाओं के शुरू होने से वह व्यवस्था ही चरमराने लगी है, जो टेलीकॉम कंपनियों को एसएमएस से मुनाफा कमाने का मौका देती थी। इसके नए एप्लीकेशन एकदम मुफ्त हैं और जब आपको फोन के सिग्नल भी न मिल रहे हों, इनके संदेश तब भी भेजे जा सकते हैं। इस साल की शुरुआत में फिनलैंड के मोबाइल नेटवर्क सोनेरा ने बताया था कि क्रिसमस पर भेजे जाने वाले संदेश पिछले साल के मुकाबले एक करोड़ से घटकर 85 लाख हो गए। हांगकांग में क्रिसमस के संदेशों में 14 फीसदी की कमी आई। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इस तरह के संदेश अब विदा हो जाएंगे, या मोबाइल ऑपरेटर्स का भट्ठा बैठ जाएगा। एसएमएस से उन्होंने काफी पैसा कमाया है और अफ्रीका व भारत जैसे देशों में अगले सात-आठ साल तक और कमाते रहेंगे। और अगर यह खत्म हो ही जाते हैं, तो मोबाइल ऑपरेटर आप से पैसा हासिल करने का नया तरीका निकाल लेंगे। मसलन, वे डाटा ट्रांसमिशन की कीमत बढ़ा सकते हैं। लेकिन छोटे-छोटे संदेशों की कहानी यहीं खत्म नहीं होगी। ट्विटर पर भेजे जाने वाले संदेश भी तो ऐसे ही संदेश हैं। बस इन्हें भेजने का तरीका बदल जाएगा। एक-दूसरे को छोटे संदेश भेजना लोगों को अब भी ज्यादा सुविधाजनक लगेगा।
गाजिर्यन से साभार (ये लेखक के अपने विचार हैं)
00

टिप्पणियाँ
स्थानीय ख़बरें
एन सी आर
पंजाब
उत्तराखंड
उत्तर प्रदेश
बिहार
झारखंड
लाइवहिन्दुस्तान पर अन्य ख़बरें
आज का मौसम राशिफल



ई-मेल
