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हल के बजाय विवाद को हवा दे रहा है चीन
गौरीशंकर राजहंस, पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत First Published:06-12-2012 07:10:37 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

भारत से सीमा विवाद के मामले में चीन की चालाकी एक बार फिर उजागर हुई है। चीन ने अपने नए ई-पासपोर्ट में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को चीन का हिस्सा दिखाया है। इससे भारत-चीन सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पंडित नेहरू के समय में जब भारत और चीन की सीमा को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था, तब पंडित नेहरू ने अनेक ऐतिहासिक दस्तावेजों का साक्ष्य देकर चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई को लिखा था कि अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन हमेशा से भारत के अंग रहे हैं। चाउ एन लाई ने इन दस्तावेजों की अनदेखी कर दी और कहा कि भारत और चीन नजदीक के मित्र हैं। अत: यह छोटी-मोटी समस्याएं मिल-बैठकर बातचीत द्वारा सुलझा ली जाएंगी।

विवाद अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी हुआ था। पंडित नेहरू ने चाउ एन लाई को कहा था कि 1914 में भारत के तत्कालीन ब्रिटिश प्रतिनिधि मैकमोहन और तिब्बत के प्रतिनिधि के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके अंतर्गत तिब्बत ने मैकमोहन रेखा को सीमा मान लिया था। चाउ एन लाई का कहना था कि उस समय के तिब्बत के शासकों ने चाहे मैकमोहन लाइन की सीमा मान ली हो, परंतु चीन ने इसे कभी नहीं माना था। पंडित नेहरू का चाउ एन लाई की मित्रता और उनके निष्पक्ष फैसलों पर पूरा भरोसा था। वह यह मानकर चलते थे कि चीन और भारत दोनों उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा सताए गए हैं।

आजादी मिलने के बाद स्वाभाविक रूप से ये दोनों देश परम मित्र बन जाएंगे। परंतु चीन हमेशा से एक विस्तारवादी देश रहा है।1949 में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। जबकि भूटान की तरह तिब्बत भी भारत का एक संरक्षित देश था। सुरक्षा ओर वैदेशिक मामलों में तिब्बत की सरकार पूर्णत: भारत पर आश्रित थी। तिब्बत में भारत के पोस्ट ऑफिस थे। वहां भारत की मुद्रा चलती थी और भारत द्वारा चलाई जाने वाली छोटी रेलगाड़ी भी चलती थी। विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारत के सिपाही वहां तैनात थे।

चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया और उसकी 38 हजार वर्ग मील जमीन पर कब्जा कर लिया,जो उसने आज तक वापस नहीं की है। उसने पिछले 50 वर्षों में दजर्नों बार भारत से यह वायदा किया कि दोनों देशों के प्रतिनिधि मिल-बैठकर सीमा विवाद को सुलझा लेंगे। परंतु वह इन वायदों पर कायम नहीं रहा और पिछले 50 वर्षों में उसने भारत की एक इंच जमीन भी वापस नहीं की। बहुत दिनों तक चीन सिक्किम को अपने देश का हिस्सा मानता था। अब भी वह उसे पूरी तरह भारत का हिस्सा मानने को तैयार नहीं है। तमाम सीमा वार्ताओं के बावजूद चीन अपने रवैये पर अड़ा हुआ है। इसलिए समय आ गया है कि अब भारत को चीन के बारे में अपनी नीति बनाने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
 
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