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काश! हम औपचारिक रूप से एलियन होते!
नीरज बधवार
First Published:06-12-12 07:09 PM
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एक राष्ट्र के रूप में भारत के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अपने आप में स्वतंत्र ग्रह न होकर हम इसी धरती का हिस्सा हैं, जिसके चलते हमें बाकी राष्ट्रों से मेल-मिलाप करना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय आयोजनों का हिस्सा बनना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय मापदंडों पर खरा उतरना पड़ता है, जिससे हम सफोकेशन फील करते हैं। हमें लगता है कि हमारी निजता भंग हो रही है। हमारे बेतरतीब होने को लेकर अगर कोई उंगली उठाता है, तो हमें लगता है कि वह ‘पर्सनल’ हो रहा है।

हमारी हालत उस शराबी पति की तरह हो जाती है, जो कल तक घर में बीवी-बच्चों को पीटता था और आज वह मोहल्ले में भी बेइज्जती करवाकर घर आया है। अब घर आने पर वह किस मुंह से कहे कि मोहल्ले वाले कितने गंदे हैं, क्योंकि पति के हाथों रोज पिटाई खाने वाली उसकी बीवी तो अच्छे से जानती है कि मेरा पति कितना बड़ा देवता है! उसके लिए ‘डिनायल मोड’ में रहना कठिन हो जाता है।

नाराजगी में वह घर बेचकर किसी निर्जन टापू पर चला जाता है। जहां वह ‘अपने तरीके’ से रहते हुए बीवी-बच्चों को पीटे व उसे शर्मिंदा करने वाला कोई न हो। मगर राष्ट्रों के लिए यह आसान नहीं होता। होता तो एक राष्ट्र के रूप में हम किसी और ग्रह पर शिफ्ट कर जाते, जहां हम अपने तरीके से जीते। विकास नीतियों की आलोचना करते हुए जहां कोई रेटिंग एजेंसी हमारी क्रेडिट रेटिंग न गिराती, सरकारी दखल पर इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी ओलंपिक से बेदखल न करती, ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल जैसी संस्था हमें भ्रष्टतम देशों में न शुमार करती। एमनेस्टी इंटरनेशनल मानवाधिकारों के हनन पर हमें न धिक्कारती।

और अगर कोई उंगली उठाता, तो हम उसे विपक्ष का षडय़ंत्र बताते, अंतरराष्ट्रीय एनजीओ का दलाल बताते, सांविधानिक संस्थाओं पर शक करते व आम आदमी के विरोध करने पर उसे 66 ए के तहत भावनाएं आहत करने का दोषी बता गिरफ्तार करवा देते। काश! हम स्वतंत्र ग्रह होते, तो दुनिया से बेफिक्र, अपने ‘डिनायल मोड’ में जीते व खुश रहते। वैसे भी दुनिया का हिस्सा होते हुए दुनिया को एलियन लगने से अच्छा है, हम औपचारिक रूप से एलियन होते!

 
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