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सत्य की खोज
श्री आनन्दमूर्ति First Published:06-12-12 07:09 PM

सत्य क्या है? वह, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। लेकिन इस जगत में जो कुछ है, वह देश -काल-पात्र के बीच सीमाबद्ध है। स्वभावत: ही देश बदलने से प्रपंच जगत का परिवर्तन होता है, काल बदलने से भी परिवर्तन होता है, पात्र बदलने से भी परिवर्तित हो जाता है। दूसरी ओर जो सत्य है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिए सत्य खोजने के लिए देश परिक्रमा का कोई प्रयोजन नहीं है या घर छोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है।

एक मजेदार कहानी है। एक ब्राह्मण थे। उनकी ब्राह्मणी अपने स्वार्थ की सिद्धी के लिए रोज पानी में डूबकर मरने का नाम लेकर उनको डराती थी। एक दिन जब ब्राह्मणी ने पानी में डूबकर मरने की बात कही, तो ब्राह्मण चुप हो गया। मरने के पहले सभी आभूषणें को बक्सा में लेकर पत्नी चल पड़ी। ब्राह्मण ने कहा जब मरना ही है, तो गहनों का क्या करेगी। कोई उत्तर न देकर ब्राह्मणी घर के पास के उस पोखर की तरफ चली गई, जिस पोखर में घुटने भर भी पानी नहीं था। ब्राह्मणी चलती रही और कहने लगी, मैं मरने को चली। ऐसा करते-करते पानी में उतर गई। ब्राह्मण ने तब भी कुछ नहीं कहा, चुप रहा।

अंत में ब्राह्मणी ने जब देखा कि ब्राह्मण कुछ नहीं बोल रहा है, तब वह बोली, मेरे मर जाने पर तुमको भात-दाल पकाकर कौन देगा? चलो घर लौट जाएं। ऐसी बातें केवल हंसी की खुराक है। मरने जा रही हूं, कहने के पहले ही ब्राह्मणी को विचार कर लेना चाहिए था कि काम सही है या नहीं। उसी तरह कोई काम करने के पहले मनुष्य को विचार कर लेना चाहिए था कि काम सही है या नही। इस दुनिया में जो अपरिवर्तनीय है, वही सत्य है। अत: जो मनुष्य घर छोड़कर मानवता की सेवा के लिए कूद पड़ते हैं, वे ही जगत में स्मरणीय होकर इतिहास के पन्नों में अपने हस्ताक्षर छोड़ जाते हैं। वही इस जगत का सत्य है।
 
 
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