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समय हर जख्म को भर देता है
आशीष नंदी, प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक First Published:05-12-12 10:28 PM

बीस साल पहले छह दिसंबर को हुए बाबरी विध्वंस पर जब हम आज सोचने बैठते हैं, तो मौजूदा संदर्भों में सांप्रदायिकता और सुरक्षा पर उस घटना के प्रभाव को समझने की जरूरत है। पिछले कुछ समय में सांप्रदायिकता को लेकर हमारे समाज में काफी बदलाव आया है। क्या धर्म और जाति को लेकर हम ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं? सांप्रदायिक हिंसा फिर से न हो, इसके लिए क्या हम और प्रशासन तैयार हैं? ऐसे कई सवाल लगातार हमारे विमर्श में मौजूद रहते हैं। इसी से फिलहाल सवाल निकलता है कि बाबरी विध्वंस के बीस साल बाद क्या हम और हमारे आस-पास का माहौल पूरी तरह से बदल चुका है?

सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि सुरक्षा बुनियादी तौर पर ‘स्टेट ऑफ माइंड’ है। हमारे मन में जब यह बात बैठ जाती है कि हम असुरक्षित हैं, तभी हमें आस-पास के माहौल से असुरक्षा की भावना महसूस होती है। आप देखेंगे कि देश में सांप्रदायिकता के नाम पर जितनी राजनीति होती है, आम लोगों के बीच में उतनी धार्मिक कट्टरता नहीं है। ऐसे में, राजनीति के जरिये लोगों के जेहन में खौफ भरा जाता है। अब वर्तमान  माहौल में इनसे जुड़े तथ्यों पर गौर कीजिए।

सबसे पहले तो आज के दौर में दंगे करना या करवाना नामुमकिन-सा है, क्योंकि दंगे करने व करवाने वालों को मानवाधिकार संगठनों व स्वयंसेवी संस्थाओं का खौफ है। हमारे देश का कानून है, हमारा संविधान है, सरकार के स्वायत्त अंग हैं। और सबसे अहम, जनता जागरूक है। ऐसे असामाजिक तत्वों को मालूम है कि इतिहास हमारा पीछा कर रहा है। इसलिए भी बंटवारे से लेकर गुजरात दंगों तक में हमने देखा कि दंगे करने वाले पहले से ज्यादा सतर्क हुए और उनके दंगों का क्षेत्र व असर सिमट गया है। दूसरी ओर, कानून का शिकंजा भी कसता जा रहा है और जनता भी जागरूक होती जा रही है।

दूसरा तथ्य, सांप्रदायिक दंगा एक शहरी घटना है। भारत की तीन-चौथाई आबादी गांवों में रहती है, जिसमें महज 3.5 फीसदी दंगों से प्रभावित हुई है। इसके अलावा, 98 फीसदी से भी ज्यादा सांप्रदायिक दंगे महानगरों, शहरों और उन गांवों में हुए हैं, जो शहर के करीब हैं। अयोध्या की गिनती शहरों में होती है। तीसरा, यह कहना पूरी तरह से गलत है कि दंगों की जड़ में धार्मिक मसले होते हैं। अक्सर सांप्रदायिक दंगे धर्मनिरपेक्ष मसलों से शुरू होते हैं। जमीन विवाद, महिलाओं से छेड़छाड़, दूसरे धर्म में शादी और पेशेवर प्रतिद्वंद्विता- इसके मुख्य कारण हैं। बेशक, आगे चलकर इसे धार्मिक रंग दे दिया जाता है। यानी जो सेकुलर घटनाएं हैं, वे किन्हीं वजहों से नॉन-सेकुलर घटनाओं को बढ़ाने का काम करती हैं।

तीसरा तथ्य, दंगा भड़कने के बाद लोग अपने-अपने हित साधने में लग जाते हैं। इसमें सबसे बड़ा हित होता है लूटपाट करना। इसलिए अक्सर दंगों में दुकानों को निशाना बनाया जाता है। बलात्कार जैसे कृत्यों को भी अंजाम देने के लिए लोग दंगे में शामिल होते हैं। बंटवारे के वक्त भी यही हुआ था और गुजरात दंगों में भी इसी तरह की रिपोर्ट आईं। दरअसल, मसला यह होता है कि बहती गंगा में हाथ धो लो। इसलिए असामाजिक तत्व काफी सक्रिय हो जाते हैं। जैसे ही ‘ऊपर’ से खुली छूट मिलती है, ये अपना काम करके भाग लेते हैं। चौथा तथ्य, ये लोग स्थानीय नहीं होते। यह एक बहुत बड़ा सच है और अगर इसे समझ लिया जाए, तो दंगे न हों। अगर दंगों में कुछ स्थानीय शामिल भी होते हैं, तो वे गुमराह किए होते हैं। बाबरी विध्वंस और दंगों में जो लोग शामिल थे, वे बाहरी ही थे। स्थानीय लोगों की भावनाएं तब भड़कीं, जब राज्य सरकार ने पुलिस कार्रवाई के आदेश दिए, जिसमें कुछ स्थानीय लोग भी पिट गए। अगर विवादित स्थान को राष्ट्रीय स्तर पर तूल न दिया जाता या इस पर राजनीति न होती, तो स्थानीय लोग इसे कब का सुलझा चुके होते। पांचवां तथ्य, सांप्रदायिक हिंसा राजनीतिक कूटनीति का एक हिस्सा है। इसमें कोई भी पार्टी दूध की धुली हुई नहीं है। यह इसलिए है कि हमारी राजनीति में विचाराधाराओं की कमी है और हम धर्म और जाति के नाम पर वोट देते हैं।

एक सच्ची कहानी जानिए। यह कहानी तब की है, जब बाबरी विध्वंस के बाद 92 के दंगे ने देश को हिलाकर रख दिया था। ऐसे विषम हालात में एक हिंदू परिवार ने एक बुजुर्ग मुसलमान को अपने यहां पनाह दी। उस बुजुर्ग को उन्होंने अपनी बहू के कमरे में छिपाकर रखा। जब दंगाई घर-घर जाकर अल्पसंख्यकों को तलाशने लगे, तो इस बुजुर्ग की पहचान घर की बहू के चाचा के तौर पर कराई गई। लेकिन जब ये सारी घटनाएं घट रही थीं, तो उसी घर का लड़का लापता हो गया। बाद में जब दंगा शांत हुआ, तब लड़का भी मिल गया। वह दंगाइयों की भीड़ में शामिल हो गया था। इससे यह साफ होता है कि सांप्रदायिक मसलों पर एक ही घर के दो सदस्यों के बीच मतभेद मुमकिन है और इन सबके बावजूद अलग-अलग धर्मो को लोग एक-दूसरे को बचाने के लिए आगे आते हैं। भारत ऐसे कई किस्सों से भरा पड़ा है। 92 के दंगे से लेकर गुजरात दंगों तक में हमने यही देखा है कि लोग इंसानियत के नाते एक-दूसरे की मदद करते हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यह भारत में आम है। अगर इसे और ज्यादा विस्तार दें, तो दक्षिण एशिया का ऐसा ही माहौल है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हमारा समाज समुदायों के आधार पर बसा हुआ है,  न कि हिंदू-मुस्लिम समाज के तौर पर। और यही हमारी हिन्दुस्तानी तहजीब है। दूसरे मुल्कों में ऐसी संस्कृति लगभग नहीं है। यहां सब एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ होते हैं। शायद इसलिए भी हम दंगों से उबरकर फिर से जीने लगते हैं। लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि समय हर जख्म को भर देता है। देश में जो बड़े दंगे हुए, उनकी टीस कभी-कभी उठती है। लेकिन छोटे-मोटे विवादों को हम भुलाकर आगे बढ़ चुके हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
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