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बहस में किसान, मगर बिना समाधान
प्रताप सोमवंशी, वरिष्ठ स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, दिल्ली
First Published:04-12-12 07:27 PM
खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश पर संसद में बहस। किसानों के सवाल पर फिर संसद में रटे-रटाए तर्क। कुछ तथ्यों का हेर-फेर हटा दें, तो दशक पुराने भाषण और आज में कोई अंतर नजर नहीं आता। सवाल जरूर जागता है कि समाधान का दरवाजा कहां है? पिछले कई महीनों से चले आ रहे इस मुद्दे को लेकर सिर्फ दो पक्ष सामने आए हैं, या तो लुभाने की बात की जा रही है या फिर डराने की बात। समझाने और रास्ता सुझाने की कोशिश कहीं नजर नहीं आती। सरकार एफडीआई को किसानों की मुश्किल का अंतिम हल बता रही है, विपक्ष गुलामी का प्रतीक। किसानों के साथ इन रिटेल कंपनियों का व्यवहार क्या होगा, यह सवाल इतना जटिल है कि सिर्फ कह देने से कि किसानों को बेहतर दाम मिलेगा, बात पूरी नहीं होती। इस संबंध में एक दस्तावेज तक सरकार की ओर से सार्वजनिक नहीं किया गया है। दरअसल, खतरा यह दिखता है कि सरकार पांच साल पहले बजट में सब्सिडी हटाने की बात करती है, कहती है कि नकद सब्सिडी की व्यवस्था की जाएगी। वह व्यवस्था करने में पांच साल लग जाते हैं और जो स्वरूप आया, उस पर विवादों की काली छाया है। बजट का दस्तावेज टटोलें, तो इस बारे में उसमें कुलजमा छह लाइनें मिलती हैं।
यूं तो भारत को किसानों का देश कहा जाता है, लेकिन बजट देखेंगे, तो हर जरूरी सवाल को गिनती की पंक्तियों में निपटा दिया जाता है। आखिर में नुकसान फिर किसानों के घर जाकर बैठ जाता है। सूरत फिर वैसी ही कुछ नजर आ रही है। आने वाले दिनों में खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के फैसलों पर आखिरी मुहर भी लग जाएगी। वालमार्ट ने पहले से अपना स्टोर कुछ महीनों में बनाने का ऐलान कर दिया है। सभी रिटेल कंपनियों को कारोबार करने की पूरी सहूलियत होगी, बस उनका किसानों से कैसा बर्ताव होगा, इस असर को परिदृश्य में डाल दिया जाएगा। पिछले तजुर्बे कुछ इसी ओर इशारा करते हैं। देश में अरसे से विदेशी कंपनियां गेहूं खरीद रही हैं। लेकिन सीजन में गेहूं आठ रुपये किलो नहीं बिकता है और आशीर्वाद का आटा बाजार में 28 रुपये किलो मिलता है। सरकार के पास इस बात का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है कि ये कंपनियां कितना गेहूं खरीद रही हैं, कितना नहीं।
ये कंपनियां सीधे किसानों से खरीद रही हैं या आढ़तियों से, इस पर भी कोई नियंत्रण या जवाबदेही नहीं है। यह जो 20 रुपये बाजार के हिस्से जा रहे हैं, जब वालमार्ट आएगा, तो किसानों व उपभोक्ताओं के पास कैसे जाएंगे? कोई इस तंत्र को समझाने वाला नहीं है। सच्चाई यह है कि इस व्यवस्था ने न किसानों के गेहूं का दाम बढ़ाया, न बाजार में आटा सस्ता किया। सवाल फिर से सिर उठाता है कि रिटेल एफडीआई से कैसे किसानों का भाग्य जागेगा? खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को लागू किए जाने के तीन बड़े कारण गिनाए जा रहे हैं। एक, किसानों को बेहतर दाम मिलेगा। दो, रोजगार बढ़ेगा। तीन, देश में भंडारण क्षमता बढ़ेगी, इससे बड़ी मात्र में फल-सब्जियां और अनाज की बर्बादी रुकेगी। सरकार के इन दावों से ऐसा लगता है कि अगर रिटेल में एफडीआई न आया, तो हम तबाह हो जाएंगे और सरकारों की अपनी कोई भूमिका नहीं है।
जो कुछ किसानों के लिए बेहतर होगा, वह इन कंपनियों की कृपा से ही संभव है। इन सारे उजले और काले पक्षों को लेकर इंटरनेट की पड़ताल में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का एक अध्ययन मिलता है, जिसकी लंबी रिपोर्ट में भी किसानों का सवाल कुछ लाइनों में सिमट जाता है, सब कुछ अस्पष्ट-सा। एक ऐसा फैसला, जो हमारे गांव को सबसे अधिक प्रभावित करेगा, उसके लिए हमने कोई बड़ा अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं किया। सारा समर्थन और विरोध विदेशी अनुभव और अध्ययनों पर आधारित है। सरकार के पास चीन का तुलनात्मक विवरण तो उपलब्ध है कि कैसे वहां 2008 के बाद संपन्नता बढ़ी। विपक्ष के पास अमेरिका और फ्रांस की कुछ रिपोर्ट हैं, जिनके आधार पर रिटेल में एफडीआई को खारिज किया जा रहा है। यानी हममें अपनी समझ के आधार पर अपनी नीति बनने की या तो सामथ्र्य नहीं है या संकल्प की कमी।
राजनीतिक दलों के लिए एफडीआई एक तीर है, जिसे वोट के निशाने पर अलग-अलग तरीके से साधा जा रहा है। इन दलों ने अपने-अपने तर्क गढ़ लिए हैं। कुछ यूं देखिए। कांग्रेस उदार अर्थव्यवस्था को तरक्की का आखिरी सच बता रही है। भारतीय जनता पार्टी के लिए खुदरा कारोबारी उसके थोक वोट बैंक का हिस्सा है। इसलिए सारी लड़ाई का मुंह उसी ओर मोड़ रही है। समाजवादी पार्टी एफडीआई के बहस वाले दिन एक तीसरा मुद्दा निकालती है कि मुस्लिम युवकों को बिना गुनाह जेल में रखा जाता है, इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई जाए। बहुजन समाज पार्टी का कहना है कि प्रमोशन में आरक्षण पर अगर सरकार अपना रुख साफ करे, तो उनकी पार्टी एफडीआई पर हां कर सकती है।
तृणमूल कांग्रेस की बात करें, तो उसे पश्चिम बंगाल में यह दिखाना है कि गरीबों और छोटे कारोबारियों की असली हितैषी वह है, न कि वाम दल। कुल इतने ही दलों का इधर या उधर होना संसद में बहुमत के निर्णय का होना, न होना तय कर देता है। एआईडीएमके और डीएमके अपनी आपस की राजनीति में ही एफडीआई को फुटबॉल बनाकर खेल रही हैं। किसानों का सवाल जब-जब संसद के समक्ष आता है, तब वह प्रचलित बयानों और मुहावरों में उलझकर रह जाता है। सबके पास अपनी-अपनी सुविधाओं के आंकड़े हैं, जो खुद को सही और दूसरे को गलत साबित करते हैं। देश के योजना आयोग का हाल यह है कि वहां के सदस्यों को गांव का सच समझने के लिए पीपली लाइव फिल्म दिखाई जाती है।
गांव और किसान से उनका रिश्ता कुछ यूं होता है कि एक आरटीआई के जवाब के मुताबिक, गुजरे तीन बरसों में कोई सदस्य देश में कहीं भी गांव का दौरा नहीं करता। विदेश यात्राओं की गिनती जरूर 10 से 50 तक का आंकड़ा छू लेती है। होना यह चाहिए था कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश से पहले यह तय किया जाता कि देश के छोटे और मझोले किसानों के लिए इसका मतलब क्या होगा। गांव के छोटे कारोबार से इसका रिश्ता किस तरह बनेगा। यह सब सरकार को तय करना है। बाजार सिर्फ मुनाफे की भाषा जानता है। इसलिए सब कुछ बाजार के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि इस सच से कोई इनकार नहीं करेगा कि ये कंपनियां यहां मुनाफा कमाने आ रही हैं, इन्हें किसानों की मुश्किलों का मुक्तिदाता मानना कहीं की समझदारी नहीं है।
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