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लड़कियों को शिक्षा से दूर करती व्यवस्था
अलका आर्य, स्वतंत्र पत्रकार First Published:04-12-12 07:26 PM

बुंदेलखंड के पन्ना जिले के प्रतापपुर गांव की इंटर की छात्र उमा का मनपंसद विषय अर्थशास्त्र है। वह जानती है कि यह विषय उसे एक अच्छा कैरियर दे सकता है, पर इसके बावजूद वह इस विषय का इंटर में चयन नहीं कर सकी। यह दलित लड़की अपने गांव से करीब 12 किलोमीटर दूर अजयगढ़ में रोजाना बस से सरकारी स्कूल जाती है। उसे इतिहास, राजनीति आदि विषयों का चयन इसलिए करना पड़ा, क्योंकि न तो गांव में अर्थशास्त्र की कोचिंग की व्यवस्था है और न ही गांव में किसी ने इस विषय की पढ़ाई की है, जो उसकी मदद कर सके। अजयगढ़ में कोचिंग का इंतजाम तो है, पर कोचिंग कक्षाएं रात के सात बजे खत्म होती हैं, उसके बाद पन्ना घाटी के उसके गांव के लिए बस नहीं मिलती। उसके डाकिया पिता आनंदी लाल अहीरवाल ने अपने बड़े बेटे को तो सतना में पढ़ने के लिए भेज दिया है, पर उमा के अजयगढ़ में ठहराने को वह तैयार नहीं।

सवाल सुरक्षा से ज्यादा बड़ा लड़की की शिक्षा को लेकर अतिरिक्त पहल करने का है। उमा जैसी हजारों लड़कियां हैं,जो ऐसे ही कारणों के चलते अपने मनपंसद विषयों की पढ़ाई नहीं कर पा रही होंगी और यहीं पर सरकारी नीतियों/कार्यक्रमों का हस्तक्षेप अति महत्वपूर्ण होता है। दरअसल, हमारा देश अब ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां पिछड़े इलाकों में महिला साक्षरता में सुधार की चुनौती के साथ ही आज की युवतियों को युवकों के बराबर मौके भी मुहैया कराना महत्वपूर्ण है। जब शिक्षा को लेकर नीतियां बनती हैं, तो इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रखा जाता कि देश भर में युवतियों की पढ़ाई के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर कितना है और कितना होना चाहिए। कई राज्यों (हरियाणा, पंजाब, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश) में आठवीं जमात के बाद अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए सरकार की तरफ से साइकिल दी जाती है और इस योजना का फायदा निश्चित तौर पर हुआ है। लेकिन इसके आगे कुछ होता नहीं दिख रहा।

अर्थशास्त्र, विज्ञान और कंप्यूटर जैसे विषयों की पढ़ाई की व्यवस्था आम तौर पर दूर-दराज के इलाकों में नहीं है। कई तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों के चलते लड़कों को तो पढ़ाई के लिए दूर भेज दिया जाता है, लेकिन लड़कियों को नहीं भेजा जाता। ऐसे विषय दूर-दराज के इलाकों में रहने वाली लड़कियों को कैसे सुलभ कराए जाएं, इसे लेकर सरकार की कोई नीति अभी तक नहीं दिखाई दी। एक तरीका तो यह हो सकता है कि इन इलाको में ऐसे विषयों की पढ़ाई की व्यवस्था की जाए। एक स्तर से ज्यादा शायद यह संभव न हो पाए। दूसरा, इसी के साथ यह भी हो सकता है कि जहां इन विषयों की पढ़ाई की व्यवस्था है, वहां लड़कियों के लिए हॉस्टल या बोर्डिग का इंतजाम किया जाए। अगर हम विकास में महिलाओं को बराबर का भागीदार बनाना चाहते हैं, तो देर-सबेर यह सब करना ही होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 
 
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