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देखते रहो.. लंगड़ा रेस को झंडी दिखा रहा है
के पी सक्सेना
First Published:04-12-12 07:25 PM
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नीम तले स्टूल पर बैठे मौलाना अपने पुराने पोस्ट ऑफिस वाले पुराने ओवरकोट में बटन टांक रहे थे। मुंह में दबे पान के साथ गुनगुना रहे थे, कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..। मुझे देखकर बोले, ‘भाई मियां, दिसंबर लग ही चुका है। अब कड़ाके के दांत बजाऊ जाड़े ने भी दस्तक दे दी है। सोचा इसे झाड़-पोंछकर धूप दिखा लूं। रखकर अभी आता हूं। फिर चलकर कहीं चाय ठोकेंगे।’ चलते-चलते बोले, ‘सुना आपने? लगातार एक से एक न्यूजों पर न्यूजें टूट रही हैं। पता नहीं, आजकल आदमी को क्या होता जा रहा है? एक जगह पर छपा है कि अपने ही देश में एक नेताजी ने (जो स्वयं काला अक्षर भैंस बराबर हैं) एक कॉलेज का उद्घाटन किया। वल्लाह! वही मसल कि लंगड़े ने रेस को हरी झंडी दिखाई या अंधे ने चश्मों की दुकान खोली। अपने इस मुल्क में क्या कुछ संभव नहीं, भाई मियां बिना पढ़े-लिखे लूमड़ बने रहना हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार है। सम्राट अकबर भी पढ़ा-लिखा नहीं था। पर शिक्षा के मंदिर का उद्घाटन करने को किस हकीम ने कहा था? अलबत्ता, एक बात तो बहुत लल्लन टाप हो गई। नेताजी ने उद्घाटन भाषण में कसम खाई कि अब वह भी पढ़ाई-लिखाई शुरू करेंगे (और शायद मरते दम तक पीएचडी कर लेंगे)।

पहले की बात अलग थी, पर आजादी के बाद से एक बात कन्फर्म हो गई है कि नेतागीरी के तईं लफंगई और कट्टेबाजी अनिवार्य है.. न कि यह निगोड़ी पढ़ाई-लिखाई।’ मुंह में लौंग फेंककर बोले, ‘अपने मुल्क के दोमुंहेपन का जवाब नहीं। जो माफिया है, वही बच्चों को नीति और सतकर्म का भाषण दिए जा रहा है। लद गए वे दिन, जब शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने एक मेडिकल कॉलेज में भाषण देने से इसलिए मना कर दिया कि उन्हें दवाओं और बीमारियों का कुछ ज्यादा ज्ञान नहीं है। यहां हाल यह है कि जिंदगी में कभी फुंसी नहीं निकली और कैंसर पर भाषण दे रहे हैं। अब तुम्हारा लिखना जरूरी नहीं रहा, यहां तो बिना हास्य-व्यंग्य के ही मुल्क के रहनुमाओं पर हंसी आती है। कम ऑन..आ गया टी स्टाल।’

 
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