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शिकायत और शर्त
लाजपत राय सभरवाल First Published:04-12-12 07:24 PM

हम कई बार शिकायत करते हैं कि सब कुछ हमारे मन के मुताबिक नहीं हो रहा। हम जो चाहते हैं, वह नहीं होता है। अपेक्षा करते हैं, पूरी नहीं होती है, और इसी सबसे शुरू होती है शिकायत। यह प्रत्यक्ष अस्तित्व में होती नहीं है, परंतु परेशान बहुत करती है। यह आभासी चुभन हमें कभी चैन से रहने नहीं देती है। कोई हमारे लिए कितना भी करे, हम शिकायत के कटु व्यंग्य को रोक ही नहीं पाते। औरों को छलनी तो करते ही हैं, हम भी इस असहनीय पीड़ा से त्रस्त रहते हैं। कहा जाता है कि अगर शिकायती के चरणों में तीनों लोक का वैभव भी रख दिया जाए, तो भी वह उसमें कुछ नुक्स निकाल ही लेगा। कोई मिला नहीं कि पूर्व नियोजित शिकायतों का पुलिंदा खोलकर रख देते हैं। हमारी शिकायत औरों से होती है, संबंधों और रिश्तों से होती है। यहां तो ठीक है, कई बार यह खुद से भी होती है।

ऐसे व्यक्ति हमेशा ही शर्तों का, उम्मीदों का, अपेक्षाओं का पहाड़ खड़ा करते हैं, जिनके पूरा न होने पर शिकायतें पनपती हैं। संत और साधु शिकायत नहीं करते और न कोई शर्त रखते हैं। संत का तात्पर्य ही है, कष्टों, मुसीबतों और संभावनाओं में भी शांतभाव से रहकर किसी तरह की शिकायत किए बिना जन-कल्याण में लगे रहना। साधु का अर्थ है, शर्तो से परे अपनी साधुता को सेवा के महायज्ञ में सतत समर्पित करते रहना। सच्चे साधु-संतों के जीवन में शिकायत और शर्त का अंश मात्र भी नहीं रहता।

लेकिन एक इंसान आखिर शिकायत और शर्त से मुक्त कैसे हो? शिकायत से मुक्ति की एक शर्त है, प्यार बांटें, सम्मान बिखेरें, अपनापन लुटाएं। ये अनमोल थाती हैं, जिन्हें भगवान ने हमें मुक्तहस्त से प्रदान किया है और हम भी इसे खुले हाथों बांटें। आगे बढ़ें, तो दूसरों को साथ लेकर चलें। और रुकें, तो सबको छाया देने वाला बरगद बन जाए। फिर कोई शिकायत नहीं बचेगी।
 
 
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