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हमारे दौर के तीन चेहरे
गोपालकृष्ण गांधी, पूर्व राज्यपाल First Published:03-12-2012 06:42:04 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

तीन लोगों की छाप मेरे दिमाग पर हाल ही में अनजाने में ही अंकित हो गई। इनमें से पहला और तीसरा आदमी वास्तविक हैं। मैने उनको एक नाम दे दिया है, जो कि उनका वास्तविक नाम नहीं है। दूसरा आदमी काल्पनिक है, लेकिन वह है वास्तविक की तरह का ही। चेन्नई के जिस उपनगर के एक फ्लैट में मैं रहता हूं, उसके पास ही तकरीबन 70 साल की उम्र का मुरुगेसन चौकीदारी का काम करता है। सड़क के कोने पर एटीएम के पास बने एक घर का वह चौकीदार है। उसके लिए महीने का हर दिन और साल का हर महीना एकदम एक ही जैसा है। एटीएम के शीशे के ठीक पीछे बिछे पांच गुणे पांच फुट के तख्त से वह हर सुबह मुंह अंधेरे सोकर उठता है। पड़ोस के किसी शौचालय से निवृत्त होता है। उसके बाद मुंह में बचे-खुचे दांतों पर वह टूथपेस्ट करता है, उसके मुंह साफ करने की आवाज इतनी ऊंची है कि पूरी सड़क के एक सिरे से दूसरे तक सुनाई देती है। उसके बाद वह अपनी लुंगी और कुर्ते को उतारकर नीली कमीज और नीली पैंट वाली अपनी वर्दी पहन लेता है। वह अपनी पैंट को जिस कमर पर बांधता है, वह कमर न के बराबर ही है। अब वह पूरे दिन के लिए तैयार है।

क्या उसके बीवी, बच्चे और पोते-पोतियां भी हैं? या वे उसे इस हाल में छोड़कर कहीं चले गए? यह सब किसी को नहीं पता। किसी को इसकी चिंता भी नहीं है। वह धीरे-धीरे बीड़ी पीता हुआ अपने शरीर को लगातार जलाता रहता है। सुबह वह जिस तरह खंखारता है, उसी तरह दिन भर उसके खांसने की आवाज भी सड़क पर गूंजती रहती है। मैं उसकी खांसी की आवाज से ही उसका हाल जान लेता हूं। यह खांसी उसके फेफड़ों की गहराई से किसी उछाल की तरह शुरू होती है, आगे बढ़ती हुई वह श्वास नालिका तक आती है और फिर मुरुगेसन के जख्मी गले से बाहर उछल पड़ती है। खांसी कितनी है, यह उसके शरीर में जमा बलगम पर निर्भर करता है, कभी वह जाकिर हुसैन की तबले की तरह कई बार संगत करती हुई दीपावली के रॉकेट की तरह हिस्स की आवाज कर खत्म हो जाती है, तो कभी उसमें पटाखे की तरह का बड़ा विस्फोट होता है।

हर बार खांसने के बाद वह आस-पास देखकर मुस्कराने लगता है, भले ही कोई उसे देख रहा हो या न देख रहा हो।
मुरुगेसन हर रोज एटीएम से निकलती लाखों रुपये की रकम को देखता है। लोग वहां कार से आते हैं, मोटरबाइक से आते हैं, पैदल भी आते हैं। इन लोगों में कलाकार भी हैं, डॉक्टर भी हैं, क्लर्क भी हैं, पेंशनर भी हैं। रद्दी वाला, इस्त्री करने वाला, सब्जी बेचने वाला, दूध वाला, अखबार वाला सब वहां से गुजरते रहते हैं। लोग आते हैं, एटीएम से कैश बटोरते हैं और चले जाते हैं। वह वहां अपनी डय़ूटी पर जमा रहता है। लोगों के पास इतना नगदी धन देखकर उसे जलन नहीं होती, जैसे उसकी उसमें दिलचस्पी ही नहीं। धन के इस प्रवाह की उसे कोई परवाह नहीं। बस वह बैठा हुआ मुस्कराता रहता है, जैसे कोई कला साधना कर रहा हो। मुझे वह उस कबीर की तरह लगता है, जो कभी कुछ नहीं लिखता, जो कभी कुछ नहीं गाता।

दूसरा आदमी है गणेशन। उसके पास एक बहुत बड़ा, आरामदेह फर्नीचर वाला एयर कंडीशन घर है। इस घर के सातों कमरों में वाल पेपर लगे हैं, जिनमें कहीं स्विट्जरलैंड का खूबसूरत आल्पस पर्वत दिख रहा है, तो कहीं कोई सुंदर-सा समुद्र तट। वह देर से सोकर उठता है, वह भी नौकर के जगाने पर। इसके बाद वह टॉयलेट में पंहुच जाता है और काफी देर बाद वहां से बाहर आता है। जहां उसके लिए सुबह की कॉफी, बिस्कुट और मेवों का कटोरा इंतजार कर रहे होते हैं। वह भी लुंगी बांधता है, जो सिल्क की होती है। जिस कमर पर यह लुंगी बंधती है, वह विशाल है। गणेशन के बारे में भी कोई बहुत कुछ नहीं जानता, उसकी सुरक्षा में लगे लोग भी। उसके बीवी, बच्चे, पोते-पोतियां किसी के बारे में किसी को भी कुछ नहीं पता। वे हैं या उसे छोड़कर चले गए? किसी ने कभी पूछा भी नहीं। एक खास समय पर कार आती है और सफारी सूट पहने गणेशन उसमें बैठ जाता है। उसकी उंगलियां लगातार मोबाइल फोन पर चलती रहती हैं। उसके कॉलर पर सोने की चेन चमकती है।

परफ्यूम और पाउडर से उसके आस-पास हरदम एक महक रहती है। वह किसी एटीएम में नहीं जाता। उसे जरूरत भी नहीं। वह बहुत देर रात लौटता है। उसे सहारा देकर उसके कमरे तक पहुंचाया जाता है। जहां वह कपड़े बदलता है और सो जाता है। मेरे मन में उसकी छवि कुबेर की है। तीसरे का नाम तो मुझे पता नहीं, लेकिन उसे मैं श्रीचंद कहना चाहूंगा। मैंने उसे पहली और शायद आखिरी बार बैंकॉक एयरपोर्ट के लाउंज में देखा था। श्रीचंद के आने से पहले वहां काफी शांति थी। कुछ यात्री चुपचाप अपने लैपटॉप पर काम कर रहे थे। कुछ पिछली रात की बची हुई नींद को पूरा कर रहे थे। लाउंज के कर्मचारी बिना ज्यादा आवाज किए आ जा रहे थे, वे धीमे-धीमे बात कर रहे थे, औपचारिकता वश लोगों से चाय-नाश्ते के लिए पूछ रहे थे। उनका नमस्कार भी हमारी तरह ही होता है, लेकिन उसमें ज्यादा विनम्रता होती है। बैंकॉक में रहने वाले एक भारतीय ने मुझे बताया था, ‘यह उन्होंने हमारी संस्कृति से ही सीखा था, लेकिन अब हम इसे भूल गए हैं।’

तभी वहां आधा दजर्न लोगों के साथ श्रीचंद पहुंचे। ये सभी भारतीय थे, जो अपनी यात्रा के बाद लौट रहे थे। उन्हें देखकर लग रहा था कि उनकी यात्रा बहुत अच्छी रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि उनके साथ कोई महिला नहीं थी। वह खाने पर बैठे और इतनी जोर-जोर से बात करने लगे कि मैं भूल गया कि इस समय बैंकॉक में हूं। वह अपने सेलफोन पर जोर-जोर से बात कर रहे थे। क्या इतना चिल्लाने की जरूरत थी? नहीं, लेकिन वह चिल्ला रहे थे। मुझे उनका एक ही शब्द याद रहा- ‘स्.साला।’ मुझे लगा कि अच्छा ही है कि यहां बहुत से लोग हमारी भाषा नहीं समझते। साला का मतलब पत्नी का भाई ही तो होता है। यह संस्कृत के शब्द ‘स्याल:’ से बना है, अर्थ इसका भी वही होता है। हम इस शब्द का अर्थ नहीं भूले, पर हमने इसे एक अलग संस्कृति दे दी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
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