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सीजन शादियों का अर्थात आज मेरे यार की शादी है
अशोक संड First Published:03-12-12 06:40 PM

आषाढ़ की महाएकादशी से लगातार चार महीने सोने वाले देवता पिछले दिनों जाग उठे। सोते अपने कुंभकरण महाराज भी पूरे छह महीने थे,  पर उनकी पहचान देवताओं की कटेगरी में नहीं है। देवता सोए, तो शादियों पर खास तौर से रोक लग गई। कालखंड चातुर्मास कहलाया। हरि जब जागे, तो घोषित कर दी गई देवोत्थान एकादशी। शयन अवधि में शुभ कार्य वर्जित। जागते ही बारात निकल पड़ती है शुभ कार्यों की। चतुर्दिक भ्रष्टाचार के समुद्र में घिरी इस धरा पर विवाह फिलहाल शुभत्व की गति को प्राप्त है। निमंत्रण पत्र पर अंकित शुभ विवाह इसका लिखित दस्तावेज है। हजारों युगल इस सीजन में आग के इर्द-गिर्द गोला बनाकर चतुभरुज हो जाएंगे। लिफाफों को बैग में ठूंसने की यही ऋतु है। सीजन मंत्रोचार न समझने वाले पंडिज्जी और कोलाहल करते बैंड बाजे वालों से लेकर डेकोरेटर, कैटरर, टेलर सभी का है। भले दूसरे दिन ही उतर जाए, पर मेंहदी कलाई से लेकर बाजू के छोर तक लगवानी है। मेंहदी लगाने वालों की भी चांदी। सीजन फिजूलखर्ची की बरसात का है। लग्नोदय सिर्फ उन सुमंगली-सुमंगलम का ही नहीं, जिनको साथ रहने के लिए फेरे लगाने हैं, दिन उनके भी फिरेंगे, जो कुछ समय पहले तक इक्के-तांगे में जुटी रहती थीं। चाबुक खाने वाली पीठ के सजने की बेला इसी सीजन में आती है।

मौसम बारातियों के सजने का भी है। शादियां रोज पहनने वाले कपड़ों में अटेंड नहीं की जाती। सर्दी में भी ब्लाउज का कट ‘लो’, हील ‘हाई। ’ भारत एक शादी प्रधान देश भी है। राजधानी में सीजन की शुरुआत में ही एक दिन में पचास हजार शादियां हुईं। बगैर दिल वाले निष्ठुर भी यहां दुल्हनियां ले आते हैं और विश्वामित्र सरीखे टाइटैनिक भी इस समंदर में डूब जाते हैं। इन दिनों घोड़ियों के हिनहिनाने व लड़कियों के ‘गिगिल’ करने का मौसम है। झूमते-रेंगते बारातियों की वजह से ट्रैफिक जाम होने का मौसम है। अनारकली डिस्को चली..से लेकर ये देश है वीर जवानों.. की धुन पर थिरकने का भी मौसम है। वाकई देश वीर-जवानों का है, जो शादी के हर सीजन में उस लड्डू को जरूर खाता है, जिसे खाने के बाद पछताने के ब्राइट चांस रहते हैं।

 
 
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