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बदलते मूड का नियोजन
ब्रह्मकुमार निकुंज First Published:03-12-12 06:39 PM

पल-पल बदलते हुए वातावरण में हम सभी जी रहे हैं। ऐसे में न चाहते हुए भी हमारा मूड निराशा या उदासी का शिकार बन जाता है। कई बार सब कुछ अच्छा और अनुकूल होने के बावजूद हम सच्चे आनंद की अनुभूति नहीं कर पाते। मूड को सदा अच्छा और खुश रखने की चाह तो हम सबकी है, पर क्या यह वास्तव में संभव हैं? इसका दारोमदार तो खुद हम पर है। बदलते मूड का गहरा प्रभाव हमारे संबंध-संपर्क में आने वालों और हमारे स्नेहियों पर भी पड़ता है। किसी भी दुखी व अशांत व्यक्ति के संपर्क में रहना कोई पसंद नहीं करता। ऐसे में, जब कोई अपना हमें सांत्वना देने की कोशिश करता हैं, तो हम और भड़क उठते हैं, क्योंकि ऐसे समय पर हम अपने अशांत स्वभाव व मूड को सभी के समक्ष जायज ठहराने की कोशिश में रहते हैं।

हमें हर शुभचिंतक दुश्मन लगता है। लेकिन हर चीज की हद होती है। हमें खुद से यह कहना ही होगा कि बस करो! हमें ऐसे कार्यों में अपना मन लगाना चाहिए, जिनसे हमें खुशी मिले। ऐसे लोगों के साथ रहना चाहिए, जो खुशमिजाज हों। सामान्य होने पर उन चीजों पर फिर से सोचना चाहिए, जिनसे ये हालात बने। क्यों बिगड़ गया था मूड? हम किसी को दोषी ठहराते भी हैं, तो क्या उससे कोई फायदा हमें मिलेगा? इससे हम बाहरी तत्वों को अपने ऊपर हावी होने का मौका देते हैं। इसीलिए हमें स्वयं इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अंतर्मुखी होकर अपने मन के भावों और भावनाओं को समझों। यह सब करने के पीछे का आशय यही है कि हम स्वयं अपने मूड और अवस्था के मालिक बनें, ताकि हम सदा आनंद और खुशी मे अपना जीवन व्यतीत करें। इसके लिए हमें अपने दिन की शुरुआत एक सकारात्मक विचार से करनी चाहिए, ‘आज चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, मैं अपनी खुद की स्थिति में रहकर अपने मूड का मालिक बन सदा खुशी में रहूंगा/रहूंगी।’
 
 
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