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सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणम् ब्रज।
उर्मिल कुमार थपलियाल
First Published:30-11-12 07:10 PM
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अब जब अगले आम चुनाव के उम्मीदवारों की सूचियां बनने लगी हैं, वह हैं कि किसी के हत्थे नहीं चढ़ रहे। सरकार के सामने वह तृणमूल कांग्रेस की तरह बिदक रहें हैं। सब उन्हें अपना उम्मीदवार बनाना चाहते हैं। उनके पास अपनी एक राजनीति है, पर सिद्धांत नहीं है। अनैतिक व्यापार उनका पुराना धंधा है। बगैर श्रम किए धन कमाना उनका शौक है। इंटर तक की शिक्षा उनके काइयांपन का कुछ नहीं बिगाड़ पाई थी। वह ऊंची चीज थे, अत: नीचता उनके आचरण में थी। जुआ खेलते तो द्रौपदी को अपने पास रखकर शेष राजपाट वापस कर देते। जो उनके चरण पकड़ता, वह पैर खींच जूता आगे कर देते।

उनका रुआब ऐसा कि देश के कई प्रतिभावान पत्रकार उनके पे रोल पर थे। कुछ जाने-माने प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को उन्होंने सम्मान, पुरस्कार, अनुदान आदि देकर उपकृत किया। सो कवि उनका स्तुति गान करने लगे। उपन्यासकारों ने उनकी दस-बीस जीवनियां लिख डालीं। कुछ लोग उन्हें गांधी-नेहरू का अवतार मानते। कुछ उनमें भगत सिंह व गुरु गोलवलकर की छवि देखते। कांग्रेस उनमें जनाधार देखती और भाजपा धनाधार। हिंदुओं के उत्सव में जाते, तो अयोध्या में मंदिर बनवाने का वायदा करते। मुस्लिम मजलिसों में जाते, तो बाबरी-ध्वंस के खिलाफ आग उगलते। वह इधर या उधर नहीं, एकदम दरमियान में थे। लिंगों में उभय लिंग जैसे।

एक दिन वह सभी दलों से बोले, चमचागिरी बंद करो। मैं प्रत्येक दल के उम्मीदवार के रूप में सभी सीटों से चुनाव लड़ंगा। किसी एक सीट से जीतकर बाकी से इस्तीफा देता रहूंगा। कोई भी विरोधी दल मेरे खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेगा। इसके लिए मैं मुंहमांगा पैसा दूंगा। जो जितना फूहड़ व जाहिल होता है, वही असली लोकतंत्रीय भी होता है। पढ़े-लिखे बौद्धिक लोगों से तो सामंतवाद की बू आने लगती है।

जाओ मेरे कहे पर विचार करो। हर सूची मे मेरा नाम होना चाहिए। निर्दलीयों में भी। सुना है कि इसके बाद सबको सांप सूंघ गया है। सब संविधान विषेषज्ञों को घेरे हुए हैं। किसी को कोई हल नहीं सूझ रहा। उनके ठेंगे से। इन दिनों लोकतंत्र निलम्बित चल रहा है, एक  सिर्फ उनके लिए।

 
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