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एक नई शुरुआत का रास्ता
एन के सिंह, राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय सचिव
First Published:29-11-12 10:44 PM
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राजनीति में एक हफ्ते का समय काफी लंबा होता है। पिछले हफ्ते जब मैंने पाकिस्तान पर लिखा था, तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है। मुहर्रम के मौके पर वहां जिस तरह की हिंसा हुई, उससे यह जाहिर होता कि सांप्रदायिक सामंजस्य बनाने में वहां की सरकार विफल साबित हुई है। इस बीच एक अच्छी बात भी हुई कि भारत और पाकिस्तान के वीजा नियमों को उदार बनाने पर राष्ट्रपति जरदारी ने अपनी सहमति दे दी। लेकिन पाकिस्तानी गृह मंत्री रहमान मलिक की भारत यात्रा स्थगित होने से इसमें थोड़ी देर लगेगी। हालांकि हमें अपनी यात्रा से जो अनुभव मिला, वह भी काफी कुछ कहता है।

हम इस्लामाबाद से सड़क के रास्ते लाहौर पहुंचे। रास्ते में हम तक्षशिला में रुके। यह ग्रैंड ट्रंक रोड पर रावलपिंडी और उत्तर-पश्चिम इस्लामाबाद से 32 किलोमीटर दूर है। गंधार काल का शहर तक्षशिला एक महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्र है, जिसे यूनेस्को ने धरोहर घोषित किया हुआ है। यह कई जगहों पर है, जिसमें सबसे पुराना ईसा पूर्व पांचवीं सदी का है। तक्षशिला संग्रहालय में मिट्टी के बर्तनों के अलावा दैनिक इस्तेमाल की कई चीजें मौजूद हैं। यह उत्तर पाठा (अब ग्रैंड ट्रंक रोड) पर है, जो गंधार को मगध से जोड़ता था। उत्तर-पश्चिम में बटीरा और कटीरा की ओर जाता है। इसका सिंध का रास्ता कश्यि से मध्य एशिया को कुनजेरा के जरिये जोड़ता है, जो सिल्क रूट का हिस्सा है। यह प्राचीन अध्ययन केंद्र नालंदा से भी पुराना है। हम जोलियन के बौद्ध मठों में भी गए, जो उच्च शिक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित किए गए थे। लाहौर के रास्ते में हम कटासराज मंदिर में भी रुके, हाल ही में पाकिस्तान सरकार ने विशेष अनुदान से इसका जीर्णोद्धार करवाया है। यहां एक झरना भी है, जहां पहाड़ से पानी आता है। पांडवों ने वनवास के सात साल यहीं पहाड़ों पर विचरण करते हुए गुजारे थे।

लाहौर को पूरब का पेरिस कहा जाता है। राजमार्ग के आस-पास इसकी नहरों की जिस तरह से सफाई हुई है, उसने पर्यटकों के आकर्षण के रूप में इसकी छवि को निखारा है। पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ, उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों और कुछ सांसदों के साथ डिनर पर आपसी बातचीत हुई। वे बिहार के विकास और सरकार की पहल के बारे में जानने को उत्सुक थे। अजमेर शरीफ से भी 250 साल पुराने सूफी धर्मस्थल दाता दरबार में जाने का अनुभव सचमुच बहुत अच्छा था। महाराजा रणजीत सिंह की समाधि और शाहजहां का मकबरा, दोनों एक ही परिसर में हैं। हम गवर्मेट कॉलेज, लाहौर भी गए जो अब एक विश्वविद्यालय के रूप में इस क्षेत्र में शिक्षा का बड़ा केंद्र है। यहां के प्रेक्षागृह में नीतीश कुमार को सुनने के लिए भारी संख्या में छात्र मौजूद थे। वे उनके प्रशासनिक अनुभवों को जानना चाहते थे और सुनना चाहते थे कि भारत से आया एक महत्वपूर्ण नेता दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने के मसले पर क्या कहता है। नीतीश कुमार का कहना था कि दोनों देशों ने जो लड़ाइयां लड़ी हैं, उनसे कोई नतीजा नहीं निकला। इसलिए अब दोनों देशों को मिलकर गरीबी, भूख और बेरोजगारी के खिलाफ जंग लड़नी चाहिए। उस बड़े हॉल में जमा हजारों छात्रों ने इस बात का तालियां बजाकर स्वागत किया।

लाहौर यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण बात थी पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से हुआ 90 मिनट का वार्तालाप। यह बातचीत उसके रावलपिंडी के विशाल फार्महाउस में हुई। इसके सुसज्जित लॉन में सैकड़ों मोर और हिरण थे। नवाज शरीफ ने पूरे विस्तार से बताया कि किस तरह से वह और अटल बिहारी वाजपेयी समझौते के एकदम करीब पहुंच गए थे, जिस सेना के तख्ता पटल ने खत्म कर दिया। जब वह वाजपेयी के बारे में बात कर रहे थे, तो उन बातों में उनकी भावनाएं और गर्मजोशी साफ झलक रही थी। नीतीश कुमार ने जब उन्हें लाहौर और पेशावर के बीच खूबसूरत राजमार्ग बनाने के लिए बधाई दी, तो वह काफी खुश हुए। यह सड़क विकसित देशों की किसी सड़क को टक्कर दे सकती है। शरीफ को बिहार के बारे में काफी जानकारी थी, उन्होंने मजाक में यह भी कहा कि पंजाब (जहां उनके भाई ही मुख्यमंत्री हैं) या सिंध में नीतीश कुमार की तरह ही किसी को मुख्यमंत्री बनना चाहिए। उन्होंने नीतीश कुमार से यह भी पूछा कि पाकिस्तान के रेलवे को किस तरह सुधारा जाए। नवाज शरीफ आश्वस्त हैं कि अगले साल आम चुनाव में उनकी पार्टी सफल रहेगी। हमारी इस यात्रा से चार मुख्य बातें उभरीं।

पहली, भारत-पाकिस्तान रिश्तों को किसी खास नजर से देखना ठीक नहीं। इसमें कई तरह की जटिलताएं हैं। पाकिस्तान ऐसी जगह भी है, जहां आतंकवादी पनपते हैं और अक्सर उनका भारत के खिलाफ इस्तेमाल होता है, पर यह खुद भी आतंकवाद का शिकार है। हो सकता है कि इसकी फौज के कुछ लोग इसमें शामिल हों, लेकिन पूरे देश के लोगों को इससे जोड़कर देखना गलत होगा।

दूसरी, हर तबके के लोग भारत से अच्छे और गहरे रिश्ते चाहते हैं। वे चाहे सियासत के लोग हों, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग हों, व्यापारिक समुदाय के लोग हों या फिर आम नागरिक हों। वहां इस बात को लेकर काफी उत्साह है कि नए वीजा नियमों और व्यापारिक रिश्तों से लोगों के हित सधेंगे। समय के साथ-साथ यही उत्साह परस्पर विश्वास में बदल जाएगा।

तीसरी, इसी के साथ राष्ट्रीय राजधानियों के अलावा, राज्यों और बाकी नगरों के बीच भी संवाद होना चाहिए। जनता के आपसी संपर्क की बात नारेबाजी से आगे जानी चाहिए। समाज के विभिन्न तबकों जैसे राजनीतिज्ञों, शिक्षा जगत के लोगों और पेशेवर लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
चौथी, यह भारत और पाकिस्तान, दोनों के हित में है कि वे आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को बढ़ाएं, परस्पर निवेश से जुड़ी समस्याओं को हल करें और सहयोग के नए आधार तैयार करें, दोनों देशों के बैंक एक-दूसरे देश में अपनी शाखाएं खोलें। इन क्षेत्रों की बाधाओं को प्राथमिकता के आधार पर खत्म करना होगा।
पाकिस्तान एक नई शुरुआत के लिए बेताब है। अतीत का बंधक बने रहना दोनों में से किसी भी देश के हित में नहीं है। उम्मीद है कि इससे नया आशावाद जन्म लेगा- इंशा अल्लाह!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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