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मालदीव के रवैये को उसकी नजर से देखिए
अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार First Published:29-11-12 10:42 PM

मालदीव सरकार ने भारतीय कंपनी जीएमआर के साथ माले के इब्राहीम नसीर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विकास के लिए किया गया 25 वर्ष का समझौता रद्द कर दिया है। यह घटना गहरी चिंता में डालने वाली है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, मालदीव को इसका वित्तीय दंड भुगतना पड़ सकता है। जीएमआर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में क्षतिपूर्ति का मामला दायर करने की बात कह चुकी है। यह परियोजना 51 करोड़, 40 लाख डॉलर की है, जिसमें 70 प्रतिशत कर्ज शामिल है। जाहिर है, कर्ज पर भारी ब्याज चुकाना पड़ता है, अत: न्यायालय में कंपनी अपने निवेश, विस्तार आदि का एक-एक विवरण देगी और मालदीव सरकार के लिए कठिनाइयां पैदा हो जाएंगी। भारत सरकार ने भी इस रवैये को अनुचित कहा है। लेकिन मालदीव सरकार टस से मस होने को तैयार नहीं। उसने एक सप्ताह के अंदर जीएमआर को देश छोड़ने का आदेश दे दिया है। सवाल यह है कि आखिर हमसे सघन रूप से जुड़े इस पड़ोसी देश को हमारी नाराजगी तक की परवाह क्यों नहीं है? यह हमारी विदेश नीति के लिए परीक्षा की घड़ी है।

मालदीव के भूगोल के सामरिक महत्व को देखते हुए उसका हमसे दूर जाना किसी आघात से कम नहीं होगा। इसलिए सरकार की पूरी कोशिश होनी चाहिए कि मालदीव किसी तरह हमसे दूर न जाए। जीएमआर के साथ मालदीव सरकार का तनाव लंबे समय से चल रहा था, उसके खिलाफ रैलियां हो रही थीं, पर पता नहीं क्यों हमारा विदेश मंत्रलय सक्रिय नहीं हुआ। मालदीव सरकार ने जीएमआर पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। वहीद नासिर के नेतृत्व वाली नई सरकार के मंत्री हवाई अड्डे के निजीकरण के बाद धांधली की बात कहते रहे हैं। नई सरकार इससे संबंधित संविदा को अवैध करार दे रही है। उसने कई बातें उठाई हैं। मसलन, हवाई अड्डे से बाहर जाने वाले प्रत्येक यात्री पर 25 डॉलर का विकास शुल्क लगाना गलत है और पार्लियामेंट ने इसकी अनुमति भी नहीं दी थी। इसी तरह, हवाई अड्डे पर अन्य शुल्क मुक्त दुकानों सहित अन्य व्यावसायिक गतिविधियों का भी विरोध होता रहा है।

कहा जा रहा है कि पिछली फरवरी में नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही मालदीव में भारत विरोधी भावनाएं विस्तार लेती रही हैं। सवाल यह है कि इतना बड़ा विरोध क्या सिर्फ सरकार बदलने के कारण हुआ? हमें निरपेक्ष होकर इस पर विचार करना चाहिए। हमारे देश की कंपनियों को बाहर काम मिलता है, तो उन्हें वहां संविदा के अनुरूप काम करते रहने की स्थिति भी होनी चाहिए, पर यह आवश्यक नहीं कि किसी कंपनी का हित ही वहां भारतीय हित हो। वहां यदि भारत विरोधी भावना वर्तमान सरकार के अंदर बढ़ी है, तो ऐसा क्यों हुआ? इसका भी विचार हमें करना चाहिए। अन्य पड़ोसियों की तरह मालदीव भी हमसे दूर न जाए, यह हमारा ही दायित्व है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
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